रविवार, 13 मार्च 2011

गो ग्रीन

गो ग्रीन
 


वो कुरिअर ब्वाय से
फूलों की डिलीवरी
तुम्हरे ऍस एम् ऍस
वो मुहब्बत भरे ई मेल
कितने पुराने ख्यालों
के हो तुम आज भी,
छोड़ो ये सब 
आ जाओ आज मेरे सामने 
थमा दो मुझे 
अपनी आँखों में लिखा 
मेरे नाम एक प्रेम पत्र 
मैं सीने से लगा उसे पढूं 
तुम मुझे नज़र भर निहारो
पूरी शाम औ रात
आओ शामिल हो जाएँ 
आज की नई धारा में 
चलो प्यार में ग्रीन हो जाएँ .

रविवार, 6 मार्च 2011

रुमाल


रुमाल
 

पुरानी फ़िल्में...
वो नायक नायिका का रूठना मनाना.    
नायिका के आंचल का उड़ना, 
नायक का उसे पकड़ना और फिर मान जाना.   
नायिका का रोना.
नायक का रुमाल निकालना,
आंसू पोंछना. 
रुमाल का कभी नायक के पास,
कभी नायिका के पास रह जाना.   
सारी उम्र उसे पास रखना.
सहेजना, प्यार करना, कभी उलाहना देना.
मैं भी तो तुम्हारे जीवन की नायिका हूँ. 
जब भी रूठी हूँ ,
उठा लाते हो कुछ पेपर नेपकिन. 
मेरे गालों के भीगने से भी पहले,
भीग जाते हैं वो, 
कहाँ सहेजूं, कैसे सहेजूं,
उन्हें दोनों हाथों के बीच गोल गोल घुमाते हो
फैंक देते हो डस्ट बिन में.
कई बार सोचती हूँ पूछूं तुमसे,
क्यों नहीं रखते हो इक रुमाल बस मेरे लिए. 
पर डरती हूँ कहीं  पूंछ न बैठो तुम,
तुम भी तो कहाँ रखती हो आंचल आज कल.

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

आहट

आहट
हर दिन की शुरुआत होती है,
आवाजों से...
घंटी की घनघनाहट...
कूड़े वाला, ढूधवाला, गाड़ी साफ करने वाला.   
काम वाली की आहट.
बर्तनों की खनखनाहट...
पास से गुजरती रेलगाड़ी 
और उसकी झनझनाहट...
बारह बजते बजते
शांत सा होने लगता है सब कुछ, 
फिर रसोई में 
कुकर की सनसनाहट...

मिक्सी की मिमियाहट...

चकले बेलन की चिचियाहट...

तीन बजे जब शरीर पलंग को छूता है   
शरीर के अंगों से आती  थरथराहट...
अनसुनी कर देती हूँ 
फिर शाम पार्क से
आती हवा की सरसराहट...
क्रिकेट खेलते बच्चों की किटकिटाहट...    
सैर करती महिलाओं की खिलखिलाहट...
लोरी गाती माँ की गुनगुनाहट...
कितना शोर, कितनी आवाजें आती हैं 
इस घर में, सारा दिन,  सब कहते हैं
रात को जब बिस्तर से लगती हूँ 
आती हैं मन से तरह तरह की आवाजें 
सुनती हूँ, समझती हूँ, समझाती हूँ,
सहलाती हूँ, पुचकारती हूँ और चुप करा देती हूँ.
क्योंकि  माहिर हूँ मैं इस काम में,
पर कभी जिद्द पर अड़ जाती हैं. 
कुछ आवाजें
आँखों के रस्ते बाहर आती हैं
फैल जाती हैं पूरे कमरे में,
न जाने घर में
किसी को क्यों नहीं सुनाई देती हैं
ये आवाजें  मेरे  सिवाय ?

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

उत्तराधिकारिणी

उत्तराधिकारिणी




चहल, चुहल शोर और हुडदंग का

माहौल था उस घर में

रहते थे जब

होली दीवाली दशहरा उस घर में.

समय बदला सरोकार बदला.

रहने लगे

इकादाशी, प्रदोष और पूनम उस घर में

मौसम बदला मिजाज़ बदला

घर करने लगा कृष्ण पक्ष उस घर में.

झलक दिखला जाये गलती से जो चांदनी

यूँ लगे की शुक्ल पक्ष है

यही कहीं उस घर में

होती रहीं आशाएं बलवती

आ ही जाएगी कभी

वो भी खिलखिला के इस घर में.

सूरत बदली, सीरत बदली

अपने साजो सामान........

अँधेरे, सन्नाटे, और अनजान डर के साथ

पसरने आ गई इक दिन अमावस उस घर में.

लोग बदले लगाम बदली.

इक दिन वो आई

इतराई, इठलाई, अलसाई

छिटकी और बिखर गई उस घर में.

बोली उनको न आना है

न वो आएंगे इस घर में

मैं हूँ मौनी अमावस "असली उत्तराधिकारिणी "

अब से मैं ही रहूंगी इस घर में.

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

प्रणय पर्व

प्रणय पर्व 







इतने बरसों बाद सही,  
इस बार सफल हो जाऊं... 
आँखों में बसने को तेरी,
मैं काजल हो जाऊं...

उर द्वार बसा लो जो मुझको, 
मैं सांकल हो जाऊं...
तेरे हांथों में आने को,
मैं आंचल  हो जाऊं...

ऐसे मुझे लजाओ आज, 
मै जमुना जल हो जाऊं...
प्रतिबिम्ब निहारो तुम अपना मुझमें 
मैं खिल के, कमल हो जाऊं...
देहावरण,  मुझे बनालो,
मैं मलमल हो  जाऊं...
तेरा स्पर्श पाते ही,
मैं निर्मल हो जाऊं...

धोकर के  सारी शंकाएं, 
मैं आज  धवल हो जाऊं... 
प्रणय पर्व मनाओ ऐसे, 
कि मैं ताजमहल हो जाऊं... 
इतने बरसों बाद सही,
इस बार सफल हो जाऊं... 

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

सरगम

सरगम




रीत गया दिन सब पीत हुआ,

अब रक्तारुण होने आया.

स्वप्नचलित से मनोभाव ने,

मन ऐसा भरमाया.

स्पर्श के आकर्षण से वो,


बाहर ना आ पाया.


हो हृदय का राजस्व अपहृत,


नैनों का पलंग बिछाया.

खिल गया सुनहला कमल,

मुख पर मृदु हास ले आया.

मधुर साज़ से सृजित साँझ ने,

साँसों का सरगम मृदुल बजाया.

सुदीर्घ विचुम्बित पलकों को,


मयूर पांख सा पसराया.


सोम सुधा की रेख सजा,


नवल अधर श्रृंगार कराया.


सोम के झरते कणों का मधुपान,

हाय! मकरंद न कर पाया.

अपने नयन कुंवारों को फिर,

मैंने तृषित सुलाया.

रविवार, 30 जनवरी 2011

मंजिलें


मंजिलें
 

कैद हैं आज भी वो मंज़र इन नज़ारों में,
जब हम भी गिने जाते थे प्यारों में.  
 
हँसते हंसाते खिलखिलाते याद आते थे,
कभी हम भी सबको  बहारों में.
 
अपने कांधों पे उठाये अपनी ही  टहनियां, 
खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.
 
उड़ती है धूल, ओढ़ लेते हैं धूल की चादर,
फिर भी खड़े हैं वो आज तलक राहों में.
 
आ गया पतझड़, रूकती नहीं धूप तक उनसे,
शुमार  हो गए  वो भी, मेरी तरह बेचारों में. 
  
रूठ जाती है, अब तो मंजिलें भी हमसे,
शिकवे भी करती हैं हमसे इशारों में
 
सिखा मुझको  मर के  जीने का हुनर, ऐ दरख़्त!
डरती हूँ, गिनी जाने से मैं बेसहारो में. 
 
मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.
 
यूँ तो जिगर छलनी, कई बार हुआ मेरा,
शामिल नहीं हूँ फिर भी  अश्कबारों में.  
 
यहाँ दूर तलक कोई अपना नहीं मिलता यारों,
आओ लौट चलें, बसें फिर एक बार तारों में.

रविवार, 23 जनवरी 2011

शून्य

शून्य



जब भी उलझती हूँ,
अंतर्मन की गांठों से.
याद आते हैं आर्य भट्ट,
शून्य के जनेता, प्रणेता
उनका गणित.
और शून्य से उलझा जीवन.
जीवन का आरम्भ शून्य अंत शून्य.
अकेला शून्य.
अपनों की भीड़ में भी शून्य.
कभी घटता, कभी बढ़ता,
विभाजित होता, हासिल होता.
पर अंततः होता है शून्य.
शून्य की धुरी है जीवन !
या जीवन की धुरी शून्य...
....दोनों एक दूसरे के पर्याय.
जानते हैं दोनों
सबको स्थान देना.
अपने पहले या बाद
अपने मूल्य के घटने बढ़ने से वेपरवाह.
सबके साथ समभाव से चले चलना.
शून्य पे सवार हो शून्य से,
निरपेक्ष शून्य में विलीन होना...

रविवार, 16 जनवरी 2011

खबर

 खबर


आसमान में आज परिंदों की खूब आवा-जाई है
वहां पे उन्होंने खूब खलबली मचाई है.
सूरज, चाँद, तारे, आसमान, बदली, जिसको देखो
सबके चेहरे पे उड़ती दिखी हवाई हैं.

जाने कैसे हैं ये परिंदे देखो,
कैसी कैसी बातें यहाँ वहां उड़ाई हैं.
"कल सूरज को बदली खा जाएगी".
बदली खूब खिल खिल के खिलखिलाई है.

"आज ये बादल फटेगा यहीं कहीं"
बादल के माथे पे लकीरें छ्नछ्नाई हैं.
"आज प्यार में वो आसमान के तारे तोड़ लायेगा"
तारों ने जान बचाने को होड़ लगाई है.

"चाँद पे अब इंसान घर बनाएगा"
चाँद ने कर ली अपने सर की धुनाई है.
"वो बचाने को जान अपनी धरती आसमान एक करेगा"
धरती आसमान की आपस में ठनठनाई है.

"राज़ खुला तो आसमान टूट पड़ेगा"
आसमान ने शुरू कर दी छुपन छुपाई है.
चाहती हूँ, कह दूँ, गलती से सही,
ये मुसीबत मेरी ही कराई धराई है.

आ गए प्रधान सम्पादक तभी, बोले,
हमने सबसे ऊँची छलांग लगाई है.
अंबर तक खब............रें
सिर्फ प्रिंट मीडिया ने पहुंचाई हैं.

सोचती हूँ, बता दूँ, सच सबको,
कल जब से अखबार की पतंगें बना
आसमान में ऊँची उड़ाई हैं.
पढ़-पढ़ कर परिंदों ने इक इक खबर,

पूरे आकाश में सुनाई हैं.
तभी से
सूरज, चाँद, तारे, आसमान, बदली, जिसको देखो,
सबके चेहरे पे उड़ती दिखी हवाई हैं.


रविवार, 9 जनवरी 2011

धागे

धागे




बाखबर से बेखबर होती रही,

समय की गठरी पलटती रही.

रातों को उठकर जाने क्यों,

मैं अपनी ही चादर सीती रही.

संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,

फिर भी सीवन दिखती रही.

अपनों की झालर बनाई सही थी,

जाने किसमें तुरपती रही.

बातें चुन्नटों में बांधी बहुत थीं,

न जाने कैसे निकलती रहीं.

ख़ुशी औ ग़म के सलमे सितारों में,

मैं ही जब तब टंकती रही.

मिलाना चाहा रिश्तों को जब भी,

अपनी ही बखिया उधडती रही,

बेखबर से बाखबर होना जो चाहा,

रातों में समय को पिरोती रही.

हाथों को मैंने बचाया बहुत,

पर अंगुश्तानो से सिसकी निकलती रही.

सुराखों से छलनी हुई इस तरह,

आँखों में सुई सी चुभती रही.

जितना भी चाहा बाहर निकलना,

धागों में उतना उलझती रही.
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