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रविवार, 5 मई 2013

शमा

शमा


कहते हैं उसे
दर्द नहीं होता
वो किसी के प्यार में
पागल नहीं होता
पलक पांवड़े नहीं बिछाता
गिरता नहीं बिखरता नहीं
बूंद बूंद रिसता नहीं
बहता नहीं टूटता नहीं
कल एक मोमबत्ती को
दिए के प्यार में
जलते सुलगते
बिखरते टूटते
सीमाओं को तोड़ते देखा
और दिया
एक जलन तपिश
आग रौशनी थी उधर
फिर भी
अपनी ही सीमाओं में
बंधा शांत
एक ठहराव
एक अकेलापन
अचानक देखती हूँ
लौ के एक भाग का
टूटना गिरना स्याह होना
अँधेरे में खो जाना
क्या इसी को कहते
दीप तले अँधेरा.

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

बस...एक दिन


बस...एक दिन 



सात फेरों में, सात जन्मों के, वादे किये हैं
एक दिन में इतने जन्म बिताऊँगी कैसे? 

प्यार करने को एक उम्र भी कम है,
एक दिन में एक उम्र जी पाऊँगी कैसे?


पाने संवरने में जिसको बरसों लगे हैं, 
एक दिन में वो प्यार दिखाउंगी कैसे?

प्यार में किसी के खोया पाया बहुत है, 
एक दिन में, ये सब, जता पाऊँगी कैसे? 

प्यार में इस तरह फली फूली हूँ इतना, 
एक दिन में इतना सिमट पाऊँगी कैसे? 

प्यार में किसी के रूठना मान जाना, 
एक दिन में ये सब निबाहूँगी कैसे?

हर पल जो मेरी आँखों सांसों में बसा है, 
बस..एक दिन में उसे दिखा पाऊँगी कैसे?

किसी ने कहा था, हर  रोज चाहूँगा तुझको, 
बस..एक दिन के प्यार में मान जाउंगी कैसे? 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

धूप-छाँव


धूप-छाँव  


धरती मैय्या की गोद में 
खेलते खेलते
धूप कब बड़ी हो गई
पता ही नहीं चला. 
वो तो एक दिन
एक मजबूत दरख्त से 
उसे लिपटते देखा 
फिर क्या था... 
प्यार के फूलों से लद गया वो पेड़
फिर फल, फिर नयी संतति 
असमंजस में थी कैसे हुआ ये सब 
नटखट हवा बोली 
अभी कुछ दिन पहले ही तो 
धूप ने इस दरख्त संग सात फेरे लिए हैं 
कन्या दान भी किया है
धरती मैय्या ने
और दहेज... में दिया है
अपनी जमा पूंजी से 
पानी, गृहस्थी चलाने को कुछ पोषकतत्व
और अखंड सौभाग्यवती होने का आशीष
सोचती हूँ.... 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

रोशनी


रोशनी

आओ रोशनी के त्यौहार में
इस बार ये कसम खाएं.
भूकंप, आतंक से सहमी दिशाओं पे,
प्यार और शांति का मलहम लगाएं.
देखें धुएं और शोर से फिर कहीं
बहरी न हो जाएँ दिशाएं.
हमारे दियों की रोशनी को
अँधेरे बस यूँ ही न निगल जाएँ.
बेवजह जम गए रिश्तों को
फिर मोम सा पिघलाएं,हिलाएँ, मिलाएं.  
निराश मायूस बैठे न रहें,
हंसी ठहाकों के बम और रॉकेट चलायें.
चेहरे पे आतिशबाजी की छटा
मन में आशा के माहताब जलाएं.
बिजली से न करें रोशनी
किसी मासूम का चेहरा रोशन कराएँ.
आओ रोशनी के त्यौहार में
इस बार ये कसम खाएं
इस बार कुछ अलग सी दिवाली मनाएं.



आप सब के लिये ये रोशनी का त्यौहार, इस बार एक फिर से नयी रोशनी लेकर आये, दीवाली की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनायें. 

रविवार, 11 सितंबर 2011

पुल

पुल


एक पुल ने दिल लगाया भी तो पहियों से,
छोटे-बड़े, मोटे-पतले.
दिल भले ही साफ़ रहा हो
पर दिखने में एकदम काले. 
देता रहा अपने चौड़े  सीने पर
सबको सहारा,
प्यार, लाड, दुलार
रौंदते रहे पहिये उसे हर दम
नहीं मिला उसे एक पल भी आराम
बदले में
नहीं माँगा उसने कभी
सीमेंट, सरिया, पानी, पेंट.
कभी सुना था उसने
बिन मांगे मोती मिले
मांगे मिले न भीख.
पर एक दिन
टाटा, बजाज, महिंद्रा, मारुती,
सबका प्यार सीने में दफ़न किये
अपने ही मौत मर गया बेचारा

रविवार, 17 अप्रैल 2011

टोटका


टोटका



न जाने क्यों आजकल
इक अजीब सा डर सताने लगा है
डर सताता है ज़माने की निगाहों का
कहीं हमारी प्यार भरी जिंदगी को
ज़माने की नज़र न लग जाये,
गली मोहल्ले और दादी माँ,
सभी के टोटके अपनाए
पर चैन नहीं आया 
सुना है हर टोटके का तोड़ भी होता है....
पर आज मैं 
इक बेजोड़, बेतोड़, रामबाण टोटका ले ही आई हूँ.
सुनो ! किसी से कहना मत ...
अब से मैं बनी रहूंगी भ्रष्टाचार
और तुम 
पुलिस के ऊँ......चे अफसर. 
दुनिया की नज़रों, में सबके सामने.
हम दोनों छत्ती....स 
एकांत,अकेले कमरों और पलों में तिर....सठ ..
बोलो, अपने प्यार को ज़माने की जालिम नज़र से
बचाने के लिए क्या मंजूर है तुम्हें ये टोटका.     

रविवार, 13 मार्च 2011

गो ग्रीन

गो ग्रीन
 


वो कुरिअर ब्वाय से
फूलों की डिलीवरी
तुम्हरे ऍस एम् ऍस
वो मुहब्बत भरे ई मेल
कितने पुराने ख्यालों
के हो तुम आज भी,
छोड़ो ये सब 
आ जाओ आज मेरे सामने 
थमा दो मुझे 
अपनी आँखों में लिखा 
मेरे नाम एक प्रेम पत्र 
मैं सीने से लगा उसे पढूं 
तुम मुझे नज़र भर निहारो
पूरी शाम औ रात
आओ शामिल हो जाएँ 
आज की नई धारा में 
चलो प्यार में ग्रीन हो जाएँ .

रविवार, 14 नवंबर 2010

जल संचयन

जल संचयन




मैं, जल पवित्र नदियों और सागर का,

उड़ के अम्बुद बन इतराता अंबर में,

देखता हूँ जब धरा पे

सूखी माटी, प्यासे तन-मन.

गिरता हूँ, टपकता हूँ, बिखरता हूँ,

सरकता हूँ, तर करता हूँ,

हर आंगन, अटारी, चौबारा और मन....

इस तरह प्यार करता हूँ इस धरिणी

और इसकी संतान से

कि यहीं से बनता हूँ ,

यहीं के लिए बनता हूँ,

यहीं पर ही मर मिटता हूँ.



मैं, जल पवित्र नदियों और सागर का

बहाया जाता हूँ घर कि नालियों में,

गंदे नालों में, सड़कों पे,

गटर में और न जाने कहाँ कहाँ.

कहते हैं सृष्टि में,

जीवन का अभिन्न अंग हूँ मैं !!!

मेरे बिन जी नहीं सकते तुम सब.

पर.... मुझे प्यार भी तो नहीं करते.



दुलारो, पुकारो, पुचकारो, थपथपाओ,

मुझे प्यार करो.

भर लो किसी पोखर, किसी बावड़ी में,

कहीं नांद, कहीं हौद में,

कर लो हर घर में, वर्षा जल संचयन

तुम सब के प्रति मेरे प्रगाढ़ प्रेम का,

एक बार, यूँ भी तो जवाब दे के देखो.

मैं, जल पवित्र नदियों और सागर का.



जल संचयन को आप अंग्रेजी में water harvesting से जानते है.

(चित्र साभार गूगल के सौजन्य से.)

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