बुधवार, 17 जुलाई 2024

अज़रबैजान यात्रा (भाग 11)

 अज़रबैजान यात्रा (भाग 11) - निजामी स्ट्रीट और हैदर अलिएव सेंटर और भारत वापसी



अज़रबैजानी चाय के कप प्लेट 

दोपहर के भोजन के उपरांत हम लोग दो जगह जाना चाहते थे एक तो हैदर अलिएव सेंटर और दूसरा निजामी स्ट्रीट। सोचा पहले हैदर अलिएव सेंटर हो लेते हैं क्योंकि मार्किट में अधिक समय लगा तो हैदर अलिएव सेंटर छूट जायेगा और आज हमारा अज़रबैजान में अंतिम दिन भी है। हम पहुंचे हैदर अलिएव सेंटर जो अब अज़रबैजान का मुख्य आकर्षण का केंद्र है। यह एक 57,500 वर्ग मीटर (619,000 वर्ग फीट) का भवन परिसर है, जिसे इराकी-ब्रिटिश वास्तुकार ज़ाहा हदीद द्वारा डिज़ाइन किया गया है और यह अपनी विशिष्ट वास्तुकला और प्रवाहमय, घुमावदार शैली के लिए जाना जाता है जिसमे कोई भी कोना नहीं है एकदम फ्लूइड डिज़ाइन है। केंद्र का नाम हैदर अलीयेव (1923-2003) के नाम पर रखा गया है, जो 1969 से 1982 तक सोवियत अज़रबैजान के प्रथम सचिव और अक्टूबर 1993 से अक्टूबर 2003 तक अज़रबैजान गणराज्य के राष्ट्रपति थे। यहाँ पर कई म्यूजियम हैं, एक थिएटर है और प्रदर्शनी स्थल भी हैं जहाँ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियां समय समय पर लगती रहती हैं। यहाँ पर एक कार म्यूजियम भी जिसमें विंटेज कारों का बहुत सुंदर और दर्शनीय कलेक्शन है। इस परिसर में प्रवेश के लिए 15 मनत का टिकेट लगता है लेकिन यह सचमुच दर्शनीय है और एक बार यहाँ अवश्य जाना चाहिए।

हमें निजामी स्ट्रीट मार्किट भी जाना था और रात की फ्लाइट भी पकड़नी थी इसलिए ज्यादा समय यहाँ नहीं व्यतीत कर सके और टैक्सी पकड़ पहुँच गए निजामी स्ट्रीट मार्किट जिसके बारे में हम पहले भी बता चुके हैं की यह अज़रबैजान का मुख्य बाज़ार है और बहुत ही व्यस्त स्थान हैं। इसका नाम शास्त्रीय फ़ारसी कवि निज़ामी गंजवी के नाम पर रखा गया है। निज़ामी स्ट्रीट बैंकों से लेकर फ़ैशन स्टोर तक कई दुकानों का घर है और यह दुनिया की सबसे महंगी सड़कों में से एक है। इस सड़क पर जर्मनी, नॉर्वे, नीदरलैंड और ऑस्ट्रिया के दूतावासों के साथ-साथ अज़रबैजान में यूरोपीय संघ का प्रतिनिधिमंडल भी स्थित है। इस बाज़ार की चौड़ी और सपाट सड़कें पूरी तरह से ट्राफिक मुक्त है और किसी भी तरह की कोई गाड़ी चार पहिया या दोपहिया, न साइकिल, न रिक्शा कुछ भी नहीं चलता है इसलिए यहाँ पैदल चलने का आनन्द है। यह बाज़ार दिन में भी उतना गुलज़ार रहता जैसा यह रात में रहता है। यहाँ सबसे पहले बकलावा मिठाई जो यहाँ की विशिष्टता है खरीदी, कुछ सोवेनिएर्स खरीदे, बच्चों के लिए कपड़े खरीदे, कुछ परफ्यूम खरीदे। हाँ! एक चाय की केतली और कुछ चाय के कप और दो तरह की चाय भी हमने यहाँ से खरीदी। चाय भी यहाँ की विशेषता है और बिना दूध की चाय ही पी जाती है। चाय के रेट भी बिलकुल अजब-गजब हैं। हमने जो चाय खरीदी उसके रेट 8 मनत/100 ग्राम या 4000/ किलो लेकिन चाय की खुशबू ऐसी कि उसकी महक सूंघकर आप उसमें खो जायेंगे फिर चाय बनाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। लेकिन सब बात एक तरफ खरीदारी तब तक पूरी नहीं कही जा सकती, जब तक कुछ ज्वेलरी ना खरीद ली जाय। सिर्फ इस सिधान्त के वजह से हम एक सिल्वर ज्वेलरी शॉप में गए और जल्दी से कुछ पेंडेंट, अंगूठियाँ वगैरह खरीद लिए। इसी सब में शाम के साढे सात बज गए थे और हमारी ग्यारह बजे की फ्लाइट थी। न कहते हुए भी वापसी का रास्ता पकड़ना पड़ा और हम निकल पड़े एअरपोर्ट की ओर और एक घंटे में एअरपोर्ट पहुँच गए। यहाँ का एअरपोर्ट भी काफी सुंदर हैं। एअरपोर्ट और इमिग्रेसन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद एअरपोर्ट लाउन्ज में जा कर कुछ कॉफ़ी पी और केक वगैरह खाया और पहुँच गए बोर्डिंग के लिए। सुबह सात बजे तक हम लोग अपने देश और अपने घर पहुँच गये थे और फिर शुरू हो गए रोज़ के सिलसिले, बस एक याद काफी दिन तक रहेगी इस सुंदर देश की।

इस यात्रा वृतांत को अब यहीं विराम। जल्दी ही एक नए सफ़र का विवरण आपके सामने जरुर रखूंगी। आप इस सफरनामे की सारी कणियों को एक बार जरुर पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया भी जरुर दीजिये।



हैदर अलिएव सेण्टर 


हैदर अलिएव सेण्टर 


हैदर अलिएव सेण्टर 


हैदर अलिएव सेण्टर 


डाक टिकेट पर हैदर अलिएव सेण्टर 


अज़रबैजानी करेंसी मनत पर हैदर अलिएव सेण्टर 




निजामी स्ट्रीट बाज़ार 



निजामी स्ट्रीट बाज़ार 


चाय का एक सुंदर टी सेट 

चाय की केतली 



चाय की केतली 


चाय की केतली 



चाय की पत्तियां


चाय की पत्तियां 


चाय की पत्तियां 


हैदर अलिएव के बाहर रात का दृश्य 

हैदर अलिएव के बाहर का दृश्य 




 

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

अज़रबैजान यात्रा (भाग 10)

   अज़रबैजान यात्रा (भाग 10) - ऐतिहासिक अग्नि पर्वत और अग्नि मन्दिर की यात्रा


अग्नि पर्वत


आज सुबह नाश्ता कर हम लोग होटल से निकल पड़े क्योंकि आज का कार्यक्रम बहुत ही व्यस्त था और कई जगह जाना बाकी था। बस फटाफट निकल पड़े जलते हुए पहाड़ पर की सैर पर। यहां आते ही एक ग़ज़ल का शेर याद आ गया -

पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श -ए - पा न था।

हम जिस तरफ चले थे, उधर रास्ता न था।।

यहां तो पूरा पहाड़ सुलग रहा था। न जाने किसकी तलाश में कबसे ये पहाड़ न जाने और कब तक सुलगेगा।

आज दुनिया में केवल मुट्ठी भर अग्नि पर्वत ही मौजूद हैं उनमें से अधिकांश अज़रबैजान में स्थित हैं। यानारडाग (जलता हुआ पहाड़) बाकू के पास कैस्पियन सागर पर अब्शेरोन प्रायद्वीप पर बाकू शहर से 25 किलोमीटर उत्तर पूर्व में एक पहाड़ी पर स्थित है और यहाँ आग लगातार जलती रहती है। लपटें एक पतली, छिद्रपूर्ण बलुआ पत्थर की परत से 3 मीटर तक हवा में उड़ती है। यह एक प्राकृतिक गैस की आग है जहाँ गैस का एक स्थिर रिसाव लगातार मिलता है इसलिए यानारडाग से निकलने वाली लौ काफी स्थिरता से जलती रहती है। यह जलता हुआ पर्वत गोबुस्तान के मिट्टी के ज्वालामुखियों से अलग है क्योंकि यानारडाग में मिट्टी के ज्वालामुखियों की तरह मिट्टी या तरल का कोई रिसाव नहीं होता है। तेज़ हवाएँ इन लपटों को कुछ विचित्र आकृतियों में बदल देती हैं जो इस क्षेत्र में रहस्य को और बढ़ा देती हैं। बस जलते पहाड़ के दर्शन करने और कुछ यादगार चित्रों को कैमरे में क़ैद करने के बाद हम निकल पड़े एक दूसरे सफ़र पर जो एक मन्दिर है।

अज़रबैजान की राजधानी बाकू के पास सुरखान शहर में स्थित एक मध्यकालीन मंदिर है जिसे ज्वाला मंदिर या आतिशगाह कहते हैं। आतिशगाह का मतलब होता है आग का घर या सिंहासन। सुरखान शहर अजरबेजान के आपशेरों प्रायद्वीप पर स्थित है जो कैस्पियन सागर से लगता है यहां की जमीन से तेल रिसता रहता है और स्वयं ही कुछ स्थानों पर आग आप ही भड़क जाती है। आग को पवित्र माने वाले पारसी धर्म के अनुयायियों के लिए भी धर्मभूमि रही है।

इस मंदिर की इमारत किसी प्राचीन किले जैसी है लेकिन मंदिर की छत किसी हिंदू मंदिर जैसी ही है। इसकी छत पर दुर्गा का त्रिशूल है। मंदिर के अंदर जो अग्निकुंड है, उससे लगातार आग की लपटें निकलती रहती हैं। मन्दिर में 26 कमरे हैं और हर एक कमरा अलग धार्मिक विश्वास को दर्शाता है। नटराज की मूर्ति को यहाँ विशेष रूप से स्थापित किया गया है।  मंदिर की दीवारों पर देवनागरी लिपि, संस्कृत और गुरुमुखी लिपि (पंजाबी भाषा) में कुछ लेख भी खोदे गए हैं। इस आतिशगाह में शिलालेख की पहली पंक्ति भगवान गणेश की वंदना करती है और दूसरी पवित्र अग्नि यानी ज्वाला की। यहां 14 संस्कृत, दो पंजाबी और एक फारसी के शिलालेख हैं। यहां के इकलौते फ़ारसी शिलालेख में व्याकरण संबंधी त्रुटियां हैं। माना जाता है कि इस रास्ते से गुजरने वाले भारतीय व्यापारियों ने मंदिर का निर्माण करवाया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक इस मंदिर के निर्माता बुद्धदेव हैं, जो कुरुक्षेत्र के पास के मादजा गांव के रहने वाले थे। मंदिर निर्माण की तारीख संवत् 1783 दीवार पर खुदी है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह भी पता चलता है कि पहले मंदिर में भारतीय पुजारी हुआ करते थे, जो यहां प्रतिदिन पूजा-पाठ करते थे। जो लोग यहां आते थे उनमें भारतीय ही ज्यादा होते थे लेकिन स्थानीय निवासी भी यहां पर मन्नत मांगने आते थे। यहां के भारतीय पुजारी मंदिर छोड़ 1860 में पलायन कर गए थे। तभी से यह मंदिर बिना पुजारी का है हालाँकि मन्दिर भजन वगैरह तो अभी भी बजाये जा रहे हैं। मन्दिर की सैर करने के बाद हम लोग खाने के लिए निकल पड़े क्योंकि भूख जोरों से लगने लगी थी।

इस पोस्ट में इतना ही अगली पोस्ट में निजामी स्ट्रीट और हैदर अलिएव सेंटर का विवरण.....



यानारडाग अग्नि पर्वत


यानारडाग अग्नि पर्वत


कुछ मस्ती 


कुछ मस्ती


कुछ और मस्ती


यानारडाग अग्नि पर्वत


यानारडाग अग्नि पर्वत


अग्नि पर्वत के मैदान में 



अग्नि पर्वत के मैदान में 


आतिशगाह - अग्नि मन्दिर में नटराज 


अग्नि मन्दिर में नटराज


अग्नि मन्दिर में प्रज्ज्वलित अग्नि 


अग्नि मन्दिर के अंदर एक कक्ष  


शिलालेख के अनुसार गणेश जी का मन्दिर


मन्दिर के अंदर का दृश्य 



मन्दिर के अंदर का दृश्य



मन्दिर के अंदर गणेश जी की मूर्ति 


मन्दिर के अंदर का दृश्य


मन्दिर के अंदर का दृश्य


मन्दिर के अंदर का दृश्य


अग्नि मन्दिर में प्रज्ज्वलित अग्नि 



अग्नि मन्दिर के मुख्य कक्ष के बाहर 

सोमवार, 15 जुलाई 2024

अज़रबैजान यात्रा (भाग 9)

 अज़रबैजान यात्रा (भाग 9) - बाज़ार की सैर


सदरक बाज़ार 


स्वादिष्ट भोजन करने के बाद याद आया कि इस यात्रा के दौरान शौपिंग तो हमने की नहीं, वापस आने पर सबको कुछ तोहफे देने भी पड़ेंगे। तब शुरू हुई एक अच्छे से शौपिंग स्थल की खोज। ऐसे तो अज़रबैजान या कहें बाकू में शौपिंग के लिए कुछ खास नहीं है क्योंकि यह खरीदारी के लिहाज से मंहगी जगह है और सभी चीज़ों के दाम अपने भारत से काफी ज्यादा हैं। लेकिन कुछ चीजें यहाँ पर विशेष हैं जैसे यहाँ की एक मिठाई जिसे बकलावा कहते है। यहाँ की अज़रबैजानी  चाय बहुत अच्छी होती है साथ ही विशेष तरह की चाय बनाने और परोसने के बर्तन। चांदी की जवेलरी भी यहाँ की अच्छी मानी जाती है । बाकी गिफ्ट आइटम्स जैसे फ्रिज मैगनेट, की रिंग बगैरह तो सभी जगह होते ही हैं ।

हमें पता चला की एक सदरक बाज़ार है जो यहाँ का होलसेल बाज़ार है और वहाँ लगभग सभी चीज़ें सही दाम पर मिलती हैं कपड़ों से लेकर क्राकरी या घरेलू सामान तक। बस फिर क्या था, फटाफट टैक्सी की और पहुँच गए सदरक बाज़ार। जैस बाज़ार के बारे में सुना था, बाज़ार बिलकुल वैसा ही था, कुछ भाग एयर कंडिशन्ड और कुछ भाग खुला हुआ। हमें ऐसे तो कुछ विशेष लेना नहीं था फिर भी सोचा अपने नाती के लिए कुछ कपडे बगैरह देख लेते हैं। कुछ कपडे खरीदे, कुछ ऐसा ही और सामान खरीदा और इसी में देखा कि दो-ढाई घंटे हो गए हैं, अब वापसी की राह पकड़नी चाहिए।

बाज़ार से बाहर निकले और टैक्सी पकड़ी और पहुँच गए होटल। शाम को माया रेस्तराँ में ही कुछ संगीत और बेली डांस का आयोजन था और हमें वहाँ भी पहुँचना था सो होटल में जाकर चाय की चुस्कियाँ लीं, कपडे बदले और निकल गए रात्रिभोज के लिए। रात्रि के भोजन और विशेष कार्यक्रम को देखकर होटल वापस आये और इस तरह एक दिन और गुजर गया और रात फिर नींद के आगोश में।

कल कुछ जगहों के बारे में बात होगी जिसमें अग्नि पर्वत और अग्नि मन्दिर और ऐसी ही कुछ और जगहें शामिल हैं.......

सदरक बाज़ार के दृश्य 



                                         सदरक बाज़ार के दृश्य 


सदरक बाज़ार के दृश्य 


                                              सदरक बाज़ार के दृश्य 




शनिवार, 13 जुलाई 2024

अज़रबैजान यात्रा (भाग 8)

    अज़रबैजान यात्रा (भाग 8) - गोबुस्तान – एक अद्भुत संग्रहालय

गोबुस्तान 

मिट्टी के शंकु रूपी ज्वालामुखी देख आश्चर्य और उत्साह को चित्त में चित्रित कर अनजाने ही हम फिर एक और आश्चर्यचकित कर देने वाले संग्रहालय की ओर बढ़ चले। ये खुले आकाश के नीचे हर रोज सूरज की भरपूर रोशनी और  चाँद की चांदनी में नहाकर निखरा हुआ संग्रहालय निकला। बाकू से लगभग 64 किलोमीटर की दूरी पर गोबुस्तान नामक पहाड़ियां हैं। गोबुस्तान राज्य के रिजर्व पुरातत्व स्मारकों के मामले में बहुत समृद्ध है। इसकी स्थापना 1966 में हुई थी जब इस क्षेत्र को पहाड़ों पर बनायीं नक्काशियों और संगीतमय पत्थरों को संरक्षित करने के प्रयास में अजरबैजान का राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल घोषित किया गया। यहाँ गोबिस्तान रॉक आर्ट कल्चरल लैंडस्केप है जो 537 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है जिसमें 6000 से ज्यादा रॉक नक्काशी है जिसमें लोग, जानवर, युद्ध के सामान, अनुष्ठानिक नृत्य, बैलों की लड़ाई, सशक्त नागरिकों के साथ भाले के साथ योद्धा, सूरज और सितारे दिखाए गए हैं यह औसतन 5000 से 30000 साल पुराने हैं। इसने राज्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिजर्व में 2006 में राष्ट्रीय दर्जा हासिल किया और 2007 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया। यह एक अनूठा आउटडोर संग्रहालय है जिसमें एक अत्याधुनिक आगंतुक केंद्र है। इन शैल नक्काशियों को पेट्रोग्लिफ्स के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पेट्रोग्लिफ्स मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन कला है। रॉक आर्ट के साथ संगीत भी जुड़ा है हजारों साल तक नावों और मछलियों को दर्शाने वाली शैल चित्राकृति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि एक समय में कैस्पियन सागर का जलस्तर संभवत अधिक ऊंचा रहा होगा जिससे तीनों पहाड़ियां लगभग द्वीप बन गई होगी। जब कैस्पियन सागर का जलस्तर नीचे उतरा तब शायद यह पहाड़ियां रहन सहन हेतु प्रयोग में आयीं और यहाँ की वन सम्पदा भोजन के रूप में।

गोबिस्तान की प्राचीन आबादी की भाषा विवादित है। लेकिन पेट्रोग्लिफ्स अभी भी वहां रहने वाले प्रागैतिहासिक लोगों के जीवन के बारे में जानकारी देते हैं। जानवरों, मनुष्यों और उनके प्राकृतिक जीवन के अनुभवों, शिकार और मृत्यु की 6000 से अधिक तस्वीरें हजारों वर्षों की अवधि में उतारी गई है। अधिकांश पेट्रोग्लिफ्स बड़ी चट्टानों पर हैं।

ऐसा अनुमान है कि लगभग 40000 साल पहले गोबिस्तान समृद्ध हरा-भरा और घने जंगलों वाला स्थान था। अंतिम हिमयुग के बाद की अवधि में गुफाओं में रहने वाले लोग हिरन और बकरियों का शिकार करते थे सवाना घास के मैदान से भोजन एकत्र करते थे और कैस्पियन सागर में नौकायन करते थे। मानव सभ्यता के इस प्रारंभिक केंद्र पर पूर्व और पश्चिम से यात्री मिलते थे और चूना पत्थर की गुफाओं की श्रृंखला में बसते थे पीढ़ी दर पीढ़ी शताब्दी तक आश्रय की दीवारों पर अपने निशान छोड़ते थे। यहां नक्काशी में योद्धा और टैटू वाली महिलाएं, बेल, हिरण, बकरियां, मछली पकड़ने के दृश्य और बलिदान के दृश्य दिखाए गए हैं। परिदृश्य इतना बदल गया है कि उसे पहचाना नहीं जा सकता है जलवायु परिवर्तन के साथ मूल वनस्पति और जीव जंतु भी लुप्त हो गए।

गोबिस्तान रॉक आर्ट कल्चरल स्थल के प्रवेश द्वार पर एक विशाल चट्टान है जो गवाल डैश रिजर्व में पाए जाने वाले चार गायन पत्थरों में से एक है। जब इस 2 मीटर लंबे भारी पत्थर को छोटे पत्थरों से मारा जाता है तो यह टैंबोरिन वाद्य यन्त्र के जैसे बजने वाली ध्वनि उत्पन्न करता है। अलग अलग स्थान से अलग अलग तरह की ध्वनियाँ निकलती हैं। अज़रबैजान भाषा में गवाल डैश का अर्थ है "टैंबोरिन पत्थर"। यह असामान्य प्रतिध्वनि चट्टान के अंदर सूक्ष्म छिद्रों की उपस्थिति के कारण है जिसे शुष्क जलवायु और क्षेत्र में प्राकृतिक गैस के प्रभाव का परिणाम माना जाता है। लेकिन यह अद्भुत है कि इतना बड़ा पत्थर इस तरह की आवाजें निकाले।

हाल के लगभग 500 वर्षों में लगभग 500 नई नक्काशियां खोजी गई है साथ ही कांस्ययुग का एक खेल जिसे "58 होल्स" कहा जाता है चट्टान पर उकेरा हुआ पाया गया है । इस क्षेत्र का अभी तक पूरी तरह से अन्वेषण नहीं हुआ है, इसलिए भविष्य में निश्चित रूप से और भी रहस्य उजागर होंगे।

इस प्राचीन स्थल की अविस्मरणीय सैर के बाद हम लोग वापस निकल पड़े बाकू शहर की और क्योंकि भूख जोरों से लग रही थी। एक सवा घंटे की कार यात्रा के पश्चात हम पहुँच गए भारतीय व्यंजनों का स्वाद लेने के लिए प्रीमियर पैलेस होटल जहाँ हम पहले भी खाना खा चुके थे। स्वादिष्ट भोजन करने के बाद याद आया कि इस यात्रा के दौरान शौपिंग तो हमने की नहीं, वापस आने पर सबको कुछ तोहफे देने भी पड़ेंगे। तब शुरू हुई एक अच्छे से शौपिंग स्थल की खोज।

लेकिन इस पोस्ट में इतना ही, शौपिंग स्थल का विवरण अगली पोस्ट में.....

पहाड़ों पर उकेरी आकृतियाँ 


और साथ में मैं भी 



पहाड़ों पर उकेरी आकृतियाँ 


पहाड़ों पर उकेरी आकृतियाँ 


पहाड़ों की ओट में 

हम दोनों 



म्यूजिकल रॉक 


म्यूजिकल रॉक का संगीत 

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