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रविवार, 6 मार्च 2011

रुमाल


रुमाल
 

पुरानी फ़िल्में...
वो नायक नायिका का रूठना मनाना.    
नायिका के आंचल का उड़ना, 
नायक का उसे पकड़ना और फिर मान जाना.   
नायिका का रोना.
नायक का रुमाल निकालना,
आंसू पोंछना. 
रुमाल का कभी नायक के पास,
कभी नायिका के पास रह जाना.   
सारी उम्र उसे पास रखना.
सहेजना, प्यार करना, कभी उलाहना देना.
मैं भी तो तुम्हारे जीवन की नायिका हूँ. 
जब भी रूठी हूँ ,
उठा लाते हो कुछ पेपर नेपकिन. 
मेरे गालों के भीगने से भी पहले,
भीग जाते हैं वो, 
कहाँ सहेजूं, कैसे सहेजूं,
उन्हें दोनों हाथों के बीच गोल गोल घुमाते हो
फैंक देते हो डस्ट बिन में.
कई बार सोचती हूँ पूछूं तुमसे,
क्यों नहीं रखते हो इक रुमाल बस मेरे लिए. 
पर डरती हूँ कहीं  पूंछ न बैठो तुम,
तुम भी तो कहाँ रखती हो आंचल आज कल.

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

हिंदी की व्यथा

हिंदी की व्यथा




संवेदना की परागरज ले


ककहरे ने गर्भ धरा था


शब्दों के भ्रूण पनपे


तो,


भाषा ने खोला नयन था


आशा की ओढ़ चुनरी


हिंदी का हुआ आगमन था


हास,


परिहास,


कथा,


कविता,


लोरी से भरा बचपन था


बन गई


उपन्यास,


ग़ज़ल,


रुबाई

आ गया भरपूर यौवन था


आंचल में भर के सोलह कलाएं,


छा गया

अल्हड़पन,

लड़कपन,

बांकपन था


भाषा की सभी विधाओं से पूर्ण उसका जीवन था


पर जबसे किया उसने अंग्रेजी का वरण था


हो गया शुरू उसका चरित्र हनन था


दिल बदले,

दौर बदले,

गया बदल उसका आचरण था


खो गया उसका मीठापन था


एक वाक्य भी अंग्रेजी बिना चल न सकी वो


आ गया जीवन में खोखलापन था


बिगड़ने लगा उसका संतुलन था


सो कम हो गया उसका चलन था


क्योंकि अंगरेजी की बैसाखियों पे

टंगा उसका लूलापन था

क्यों भूल गयी मैं, आप, हम सब


क्यों किया उसपर इतना दोषारोपण था


जिसने इतनी खूबसूरती से

खोला इस दुनिया में नयन था

उसे उपहार में हमने ही तो दिया

ये अपाहिजपन था.


तस्वीर मेरी बेटी शाश्वती ने बनाई है
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