रविवार, 5 सितंबर 2010

प्रेमिका

प्रेमिका

एक प्रेमिका हूँ मैं

हर पल तुम्हारा  और

तुम्हारे स्पर्श का साथ

कितने  अधीर हो उठते

तुम मेरे बिन

फिर तुम्हारी उँगलियों पर

 थिरकती मैं

 तुम्हारे अधर  पर विराजती

 तुम्हारी सांसों में घुलती मेरी सांसें

और मैं

जलती, मचलती, बिखरती

मिटती धुआं होती,

कितना अभिशप्त जीवन है मेरा!!!!!

जिस किसी ने  भी चाहा मुझे

उस ने यूँ ही मिटा दिया मुझे

फिर भी मन मुदित है

जानती हूँ

त्यजे, जाने कितने ही जीवन

मैंने जिसके लिए

त्यजेगा वो भी, एक दिन

अपनी सांसें मेरे लिए

तब होगी पूर्णाहुति मेरे प्रेम की

आखिर सिगरेट जो हूँ मैं



रविवार, 29 अगस्त 2010

सूरजमुखी

सूरजमुखी

  

बन के सूरजमुखी, तकती रही ताउम्र जिसे,

वो मेरा सूरज नहीं किसी और का चाँद निकला.



जब भी देखी तितलियाँ रंग बिरंगी उसने,

दिल धड़का, उछला, मचला सौ बार निकला.


 
मुझ पर न पड़ी मुहब्बत भरी नज़र उसकी,

ये शायद मेरी ज़र्द रंगत का गुनाह निकला.

 

इस क़दर ज़ुल्म ढाए हैं उसने मुझ पर,

पर दिल की बस्ती से वो आज भी बेदाग़ निकला.

 

दोष क्या दें बादलों को सूरज ढांपने का,

हाय! जब अपनी किस्मत में ही दाग़ निकला.



खड़े हैं आज भी मुंह उठाये तेरी ओर,

पर तू तो चलता फिरता इक बाज़ार निकला.


कभी तो रखेगा तू, दो जलते हुए हर्फ़ मेरी पंखुरी पे,

इसी हसरत में ये सूरजमुखी हर बार निकला.


रविवार, 22 अगस्त 2010

परिणिति

परिणिति  



हम यानि मैं और तुम

कितने खुश थे

मैं मदमस्त तुम आश्वस्त

तुम सदा ही अपनी बाहें फैलाए

मैं उनमें

लिपटती, झूलती,फिसलती

उनके बीच से निकलती

सारा सारा दिन अठखेलियाँ करती

कभी दूर जा बैठती

ये सोच की आज तुम्हे बहुत सताया

फिर अगले पल तुम्हें मायूस

अपनी ओर बाहें फैलाये देख

आ जाती खनकती हुई तुम्हारी परिधि में

याद है हमारे प्रणय की वो परिणिति

और कुछ रौशन गाँव

हमारे प्रेम की छाँव में

पढ़ता नन्हा ननकू

हमारी प्रणय परछाई

और अँधेरे में सहारा पाती एक माई

कितने खुश थे हम

याद आया ..........

जब तुम पवन चक्की और मैं हवा हुआ करते थे

रविवार, 15 अगस्त 2010

सफ़र


सफ़र






कुछ भी तो नहीं बदला

रस्ते पर के ठूंठ

हर ठूंठ की छाँव में सुस्ताती धूप.

पानी की एक एक बूंद को तरसती

समंदर में एक सीपी

कहीं कोठरी में सुबकता बचपन

कहीं बचपन में पनपता यौवन

कुछ भी तो नहीं बदला

देह में धधकता दावानल

बयार में घुलता गंधक

आँखों में तरता तेज़ाब

ये सिर्फ शब्द नहीं

कुछ न कह पाने की व्यथा है

कहते हैं

देश ने प्रगति की है

निर्धन निरीह और निर्बल

आज भी वहीँ हैं

आज से तिरसठ साल पहले

छोड़ आई थी जहाँ.




रविवार, 8 अगस्त 2010

जल प्रपात


" जल प्रपात" 




मेरे नैनों के जल प्रपात से, 
किंचित,गंधक के सोते सा 
पवित्र औषधीय जल बहता  है 
कितना व्यथित किया सबने, मुझे 
ये पावन नीर बहाने  को 
कोई निहारे खुश हो जाये 
कोई डिबिया भर घर ले जाये 
कोई पाप उतारे, कोई पांव पाखरे 
कोई भात बनाए, अपनों में बांटे  
कोई कलह उबाले, फिर छींटे मारे  
ये जग खारे जल से पोषित  
पर  मेरे दृग  दो  बूंद  न  आया  
सौ बार  मुझे यदि  जनम  मिले  तो  
मुझको  दरिया  जल में  देना  
मैं  बहूँ,  मेरे नैन  बहें
खारा पन दिन रैन रहे  
जीवन में कुछ चैन रहे  
फिर चाहें, सारा  जग  बेचैन रहे   




गुरुवार, 29 जुलाई 2010

अब से रावण नहीं मरेगा

अब से रावण नहीं मरेगा




कहते हैं, रावण व्यथित नहीं होता

मैं, कैकसी-विश्वश्रवा पुत्र

दसग्रीव

सूर्पनखा सहोदर, मंदोदरी पति, लंकेश

अपराधी हूँ ,

हाँ! मैं अपराधी हूँ...

पर मात्र एक

अक्षम्य अपराध

सीता हरण का

पर यहाँ तो होता है

प्रतिदिन

न जाने कितनी ही सीताओं का अपहरण

फिर दुस्श्शासन बन चीर हरण,

करती हैं वो, मरण का

रोज ही  वरण

एक अपराध का दंड मृत्यु

सौ अपराध का दंड मृत्यु

फिर क्यों ???

मैं एक अपराध के लिए

युग युगान्तरों तक जलूं

मैं, दशकंधर सबने देखा है

तुम सब कितने सर, किसने देखा है

मैं, लंकेश, लंकापति, दशानन

व्यथित हूँ !!!

मैं रावण हूँ

पर रामायण बदलने न दूंगा

अब मैं रावणों के हांथों नही मरूँगा

ये प्रण लेता हूँ

अब न मरुँगा,

अब न जलूँगा

जाओ ढूंढ़ लाओ,

मात्र एक राम मेरे लिए

तब तक मैं यहीं प्रतीक्षारत हूँ

मैं, कैकसी-विश्वश्रवा पुत्र

दसग्रीव

सूर्पनखा सहोदर, मंदोदरी पति, लंकेश

अपराधी हूँ ,

पर सिर्फ राम का.



रविवार, 25 जुलाई 2010

नीरवता

नीरवता




मेरी स्मृति की निर्जनता में,
मेरी सांसें सेंध लगा जाती हैं
मेरे नीरव आभूषण भी
उच्छवासों को दे जाती हैं
मैं गीत विरह के अक्सर गाती
वो प्रणय- राग सुनाती हैं
पर मेरी नीरवता तो कैद
मेरे कजरौटे में,
सुबह सबेरे आँखों में सज जाती है
मेरे नैनों की निर्जन घाटी

हिमाच्छादित होती जाती है
हिम की पसरी रेती में
निष्ठुर  यादें  संरक्षित होती जाती है
मेरी ऑंखें मौन, विरह का
स्वप्न सजाती जाती हैं
मुझे विस्मृत करती सारी स्मृतियाँ
स्वयमेव ही आ जाती हैं
मेरे जीवन के निःस्पंदन को
निःस्वन करती जाती हैं
मेरी स्मृति की निर्जनता में,
मेरी सांसें सेंध लगा जाती हैं.

रविवार, 18 जुलाई 2010

बार-कोड

बार-कोड


मेरी पलकों के  बार-कोड ने

कल जब बहुत शोर मचाया था
 
अपने बार-कोड रीडर से तुमने,

फ़ौरन मुझे पढ़वाया था

एक्सपायरी डेट पास जान


जश्न खूब मनाया था


एक्सपायरी डेट निकल गयी

तो क्या,

मैं नयी पैकिंग में आऊँगी,


अपने माथे पे बिंदिया की जगह,

क्यू टैग,  सजाऊँगी,

 अपनी देह पर जहाँ तहां,

मेग्नेटिक

सिक्योरिटी टैग  लगाउँगी  

तुम्हे छोड़ कोई हाथ लगाये,

तो बीप- बीप चिल्लाऊँगी

मार्केट के मोस्ट सेलेबल के

आगे अपनी धाक जमाऊँगी

तुम क्या समझे बहुत पढ़े हो

चालाकी तुमको आती है

घर में रहती हूँ तो क्या !!!!!

मार्केटिंग मुझको भी आती है






बार कोड, बार कोड रीडर, सेंसर टैग्स मार्केटिंग सिक्यूरिटी में उपयोग आने वाले उपकरण हैं


रविवार, 11 जुलाई 2010

मैनेक़ुइन

" मैनेक़ुइन"



मैनेक़ुइन हूँ , तो क्या हुआ  

मैं भी इंसानों सा दिल रखती हूँ

हर दिन मेरा पूनम होता

रात अमावस होती है

आधे कपड़े, पूरे कपड़े

ऐसे कपड़े, वैसे  कपड़े

जाने कैसे, कैसे कपड़े

कभी दुल्हन बनूँ

कभी नग्न रहूँ

सारा सारा दिन खड़ी रहूँ

रातों को पूरी ढकी रहूँ

मुझको भी लज्जा आती है

ऑंखें मेरी  भी भर आती हैं

सबकी बुरी नज़र सताती है

सारा दिन सब मुझको तकते हैं

मेरी बात न करते, थकते हैं

रात के अंधियारे में

हम सब मिल रोज़ सुबकते हैं

कोई मुझको भी आ कर ले जाये

घर में बिस्तर पर मुझे बिठाये

बिटिया जैसा प्यार जताए.

फिर क्यों न जीवन सफल हो जाये.


(Mannequin  - A life-size full or partial representation of the human body, used for the fitting or displaying of clothes; a dummy)





रविवार, 4 जुलाई 2010

समय


समय




असमय ही,

समय के कुछ पल बह गए थे.


सहेजा बहुत,

सो कुछ रह गए थे.


एक समय था,

समय से मेरी अंजुरी भरी थी.

पर समय, तो समय से,

सरकता रहा.

मैं सोती रही,

वो खोता रहा.

नींद से जागी,


जब सबेरा हुआ,



पर अंजुरी थी खाली,


वो न मेरा हुआ.


सहेजे बहुत मैंने,


बहके हुए पल


पर,


समय पर,


समय को बनाना न आया.

जो छूटा था पीछे,

उसको लाना न आया.


सभी को नचाया,

इशारे पे अपने


पर शायद

समय को नचाना न आया.





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