प्रेमिका

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एक प्रेमिका हूँ मैं
हर पल तुम्हारा और
तुम्हारे स्पर्श का साथ
कितने अधीर हो उठते
तुम मेरे बिन
फिर तुम्हारी उँगलियों पर
थिरकती मैं
तुम्हारे अधर पर विराजती
तुम्हारी सांसों में घुलती मेरी सांसें
और मैं
जलती, मचलती, बिखरती
मिटती धुआं होती,
कितना अभिशप्त जीवन है मेरा!!!!!
जिस किसी ने भी चाहा मुझे
उस ने यूँ ही मिटा दिया मुझे
फिर भी मन मुदित है
जानती हूँ
त्यजे, जाने कितने ही जीवन
मैंने जिसके लिए
त्यजेगा वो भी, एक दिन
अपनी सांसें मेरे लिए
तब होगी पूर्णाहुति मेरे प्रेम की
आखिर सिगरेट जो हूँ मैं
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