नीरवता
मेरी स्मृति की निर्जनता में,
मेरी सांसें सेंध लगा जाती हैं
मेरे नीरव आभूषण भी
उच्छवासों को दे जाती हैं
मैं गीत विरह के अक्सर गाती
वो प्रणय- राग सुनाती हैं
पर मेरी नीरवता तो कैद
मेरे कजरौटे में,
सुबह सबेरे आँखों में सज जाती है
मेरे नैनों की निर्जन घाटी
हिमाच्छादित होती जाती है
हिम की पसरी रेती में
निष्ठुर यादें संरक्षित होती जाती है
मेरी ऑंखें मौन, विरह का
स्वप्न सजाती जाती हैं
मुझे विस्मृत करती सारी स्मृतियाँ
स्वयमेव ही आ जाती हैं
मेरे जीवन के निःस्पंदन को
निःस्वन करती जाती हैं
मेरी स्मृति की निर्जनता में,
मेरी सांसें सेंध लगा जाती हैं.

