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रविवार, 25 अक्टूबर 2015

दशानन

दशानन

मैं रावण
अधम पापी नीच
सीता हरण का अक्षम्य अपराधी
सब स्वीकार है मुझे.
मैं प्रतिशोध की आग में जला  था,
माना कि मार्ग गलत चुना था.
किया सबने भ्रमित मुझे 
मार्ग दर्शन किया नहीं किसी ने.
मैं वशीभूत हुआ माया जाल के.
मैंने भी फिर किया
विस्तार माया जाल का. 
देख सीता मुग्ध हुआ मैं.
ये दोष तो मेरा नहीं था
फिर भी मैं मानता हूँ
मैंने हरा सीता को तो क्या?
मैंने किया छल कपट तो क्या?
मैंने दिया सीता को प्रलोभन तो क्या?
पटरानी बनाने का मन बनाया तो क्या?
पूरी लंका को विधवा बनाया तो क्या?
नहीं किया स्पर्श
सीता को उसकी अनुमति के बिना.
वो पवित्र थी जैसी रही वो वैसी. 
मरे दस सर तो दीखते हैं.
हाँ! मैं हर जन्म में 
रावण ही बनना चाहूंगा,
आज का मानव नहीं.

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

अब से रावण नहीं मरेगा

अब से रावण नहीं मरेगा




कहते हैं, रावण व्यथित नहीं होता

मैं, कैकसी-विश्वश्रवा पुत्र

दसग्रीव

सूर्पनखा सहोदर, मंदोदरी पति, लंकेश

अपराधी हूँ ,

हाँ! मैं अपराधी हूँ...

पर मात्र एक

अक्षम्य अपराध

सीता हरण का

पर यहाँ तो होता है

प्रतिदिन

न जाने कितनी ही सीताओं का अपहरण

फिर दुस्श्शासन बन चीर हरण,

करती हैं वो, मरण का

रोज ही  वरण

एक अपराध का दंड मृत्यु

सौ अपराध का दंड मृत्यु

फिर क्यों ???

मैं एक अपराध के लिए

युग युगान्तरों तक जलूं

मैं, दशकंधर सबने देखा है

तुम सब कितने सर, किसने देखा है

मैं, लंकेश, लंकापति, दशानन

व्यथित हूँ !!!

मैं रावण हूँ

पर रामायण बदलने न दूंगा

अब मैं रावणों के हांथों नही मरूँगा

ये प्रण लेता हूँ

अब न मरुँगा,

अब न जलूँगा

जाओ ढूंढ़ लाओ,

मात्र एक राम मेरे लिए

तब तक मैं यहीं प्रतीक्षारत हूँ

मैं, कैकसी-विश्वश्रवा पुत्र

दसग्रीव

सूर्पनखा सहोदर, मंदोदरी पति, लंकेश

अपराधी हूँ ,

पर सिर्फ राम का.



मंगलवार, 18 मई 2010

लक्ष्मण रेखा

लक्ष्मण रेखा




मेरे लक्ष्मण  मस्तिष्क ने
मेरे चहुँ  ओर
खींच रखे हैं
कुछ रंगीन टेढ़े - मेढ़े से घेरे.

मेरे रावण मन की
लोलुप निगाहों ने
बार बार प्रलोभन भी दिया.

शायद, मैं 
लखन के घर की कैद
से बाहर आ भी गई होती.

पर दशानन मन के
अस्फुट संवाद
घुलने लगे कानों में.

कौन बचायेगा इन्हें
राम...................???
आज के युग की
लुप्तप्राय प्रजाति !!!

कभी मन में
राम बसा करते थे
पर अब सिर्फ मैं !!!

एक मौन अट्टहास
गुंजायमान कर गया
दसों दिशाओं  को

कंपायमान हो उठा
रोम रोम
मेरी अंतर्निहित रघुबर भावनाएं
एक बार फिर हतोत्साहित हो उठी.

सच ही तो है,
आज
भावनाओ  के लिए
जगह ही कहाँ  है...???

और सीता....!!!!
कहीं अगर कोई होगी भी वो
तो कहीं वनवास, कहीं अग्निपरीक्षा दे
राख का ढेर हो चुकी होगी.

मैं अपनी लक्ष्मण रेखाओं
के घेरे मे खुश हूँ.

मै जान चुकी हूँ
मन मस्त्षिक और भावनाओं  


की जंग मे
मस्तिष्क की रेखाओं
के पास ही है
सुरक्षाकवच.



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