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रविवार, 25 सितंबर 2011

आगोश

आगोश 




रात के आगोश से सवेरा निकल गया, 

समंदर को छोड़ कर किनारा निकल गया.   


रेत की सेज पे चांदनी रोया करी,   

छोड़ कर दरिया उसे, बेसहारा निकल गया.


सोई रही जमी, आसमाँ सोया रहा, 

चाँद तारों का सारा नज़ारा निकल गया.


ठूंठ पर यूँ ही धूप ठिठकी सुलगती  रही, 

साया किसी का थका हारा निकल गया. 


गूंगे दर की मेरे सांकल बजा के रात, 

कुदरत का कोई इशारा निकल गया.  


घुलती रही मिसरी कानों में सारी रात,

हुई सुबह तो वो आवारा बंजारा निकल गया.


बाँहों में उसकी आऊं, पिघल जाऊं,
ख्वाब ये मेरा कंवारा निकल गया.

मेरी तस्वीर पे अपने लब रख कर, 

मेरे इश्क का वो मारा निकल गया.

चित्र मेरे कैमरे से, अन्य चित्रों के लिये मेरे दूसरे ब्लॉग "Perception" जिसका पता है shashwatidixit.blogspot.com, पर भी जाएँ.

रविवार, 8 अगस्त 2010

जल प्रपात


" जल प्रपात" 




मेरे नैनों के जल प्रपात से, 
किंचित,गंधक के सोते सा 
पवित्र औषधीय जल बहता  है 
कितना व्यथित किया सबने, मुझे 
ये पावन नीर बहाने  को 
कोई निहारे खुश हो जाये 
कोई डिबिया भर घर ले जाये 
कोई पाप उतारे, कोई पांव पाखरे 
कोई भात बनाए, अपनों में बांटे  
कोई कलह उबाले, फिर छींटे मारे  
ये जग खारे जल से पोषित  
पर  मेरे दृग  दो  बूंद  न  आया  
सौ बार  मुझे यदि  जनम  मिले  तो  
मुझको  दरिया  जल में  देना  
मैं  बहूँ,  मेरे नैन  बहें
खारा पन दिन रैन रहे  
जीवन में कुछ चैन रहे  
फिर चाहें, सारा  जग  बेचैन रहे   




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