" जल प्रपात"
मेरे नैनों के जल प्रपात से,
किंचित,गंधक के सोते सा
पवित्र औषधीय जल बहता है
कितना व्यथित किया सबने, मुझे
ये पावन नीर बहाने को
कोई निहारे खुश हो जाये
कोई डिबिया भर घर ले जाये
कोई पाप उतारे, कोई पांव पाखरे
कोई भात बनाए, अपनों में बांटे
कोई कलह उबाले, फिर छींटे मारे
ये जग खारे जल से पोषित
पर मेरे दृग दो बूंद न आया
सौ बार मुझे यदि जनम मिले तो
मुझको दरिया जल में देना
मैं बहूँ, मेरे नैन बहें
खारा पन दिन रैन रहे
जीवन में कुछ चैन रहे
फिर चाहें, सारा जग बेचैन रहे
