सफ़र
कुछ भी तो नहीं बदला
रस्ते पर के ठूंठ
हर ठूंठ की छाँव में सुस्ताती धूप.
पानी की एक एक बूंद को तरसती
समंदर में एक सीपी
कहीं कोठरी में सुबकता बचपन
कहीं बचपन में पनपता यौवन
कुछ भी तो नहीं बदला
देह में धधकता दावानल
बयार में घुलता गंधक
आँखों में तरता तेज़ाब
ये सिर्फ शब्द नहीं
कुछ न कह पाने की व्यथा है
कहते हैं
देश ने प्रगति की है
निर्धन निरीह और निर्बल
आज भी वहीँ हैं
आज से तिरसठ साल पहले
छोड़ आई थी जहाँ.

