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रविवार, 7 अप्रैल 2013

माँ

माँ
(एक बाल कविता)

मेरी माँ जैसी कोई माँ हो,
ऐसा कभी हुआ न होगा

स्नो व्हाइट सिन्ड्रेला सी, 
शांत सौम्य और सुन्दरता में,
उसका जैसा हुआ न होगा

रात अँधेरी सुबह सवेरे,
जब भी देखो जब भी मांगो
उसका प्यार बरसता होगा

मेरी माँ जैसी कोई माँ हो,
ऐसा कभी हुआ न होगा

दुर्गा काली सी गरिमा और,
सरस्वती सा ज्ञान लिये,
कहीं कोई भी हुआ न होगा।

सोते -जगते आते -जाते ,
अपनी बिटिया से मिलने को,
सपना एक तरसता होगा

मेरी माँ जैसी कोई माँ हो,
ऐसा कभी हुआ न होगा।

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

सृष्टि


सृष्टि



जब चाँद कभी झुक जाता है
और बादल को गले लगाता है
जब कोई कहीं शर्माता है
और झूम-झूम वो जाता है
तो बारिश का महीना आता है

जब कोई याद किसी को करता है
और सारा इतिहास गुजरता है
जब वक़्त कहीं पे ठहरता है
और आँखों से निर्झर बहता है
तो सावन का महीना आता है

जब नन्ही आँखों में कोई सुंदर सपने संजोता है
और कागज़ की कश्ती को ले कोठे पे दौड़ा जाता है
जब इन नन्ही आँखों को करने को कुछ न रह जाता है
तो रिमझिम का महीना आता है

जब अपनी बिटिया रानी का इक अच्छा रिश्ता आता है
और उस रिश्ते की खातिर इक गांठ लगाया जाता है
जब ख़ुशी-ख़ुशी गुडिया रानी के सपने को सजाया जाता है
और उसे प्रीतम के संग डोली में बिठाया जाता है
तो वृष्टि का महीना आता है

जब कामुकता को हद से बढ़ाया जाता है
और वो विकराल रूप ले आता है
जब अपनी ही बिटिया को बाप अपने पास बुलाता है
फिर उस पे बुरी नज़र दौड़ाता है
तो सृष्टि को पसीना आता है.

रविवार, 11 जुलाई 2010

मैनेक़ुइन

" मैनेक़ुइन"



मैनेक़ुइन हूँ , तो क्या हुआ  

मैं भी इंसानों सा दिल रखती हूँ

हर दिन मेरा पूनम होता

रात अमावस होती है

आधे कपड़े, पूरे कपड़े

ऐसे कपड़े, वैसे  कपड़े

जाने कैसे, कैसे कपड़े

कभी दुल्हन बनूँ

कभी नग्न रहूँ

सारा सारा दिन खड़ी रहूँ

रातों को पूरी ढकी रहूँ

मुझको भी लज्जा आती है

ऑंखें मेरी  भी भर आती हैं

सबकी बुरी नज़र सताती है

सारा दिन सब मुझको तकते हैं

मेरी बात न करते, थकते हैं

रात के अंधियारे में

हम सब मिल रोज़ सुबकते हैं

कोई मुझको भी आ कर ले जाये

घर में बिस्तर पर मुझे बिठाये

बिटिया जैसा प्यार जताए.

फिर क्यों न जीवन सफल हो जाये.


(Mannequin  - A life-size full or partial representation of the human body, used for the fitting or displaying of clothes; a dummy)





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