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रविवार, 22 जुलाई 2012

चोर हूँ मैं


चोर हूँ मैं


पिछले कुछ सालों से बीमार हूँ
एक अजीब सी लत लगी है मुझे
चोरी की
जब भी कहीं भी किसी को देखती हूँ
मेरी बीमारी उकसाती है मुझे
मन पक्का करती हूँ
फिर भी मजबूर हो जाती हूँ
चुराने को
और फिर....
चुरा लेती हूँ..
अपनी ऑंखें सबसे
पिछले कुछ समय से जुटा पाई हूँ
कुछ साहस
मिलती हूँ सबसे
मिलाती हूँ ऑंखें
करती हूँ बातें
फिर भी जाने का नाम नहीं लेती
चोरी की ये आदत
हर रोज कहीं भी कैसे भी
कुछ भी कर के
चुराती हूँ, छुपाती हूँ,
बचाती हूँ सबसे
सिर्फ अपने लिए
नहीं बनाती किसी को भी
अपना सहभागी यहाँ
नहीं बाँटती चोरी का ये माल
किसी के भी साथ
बैठती हूँ अपने साथ,
खाती हूँ अपने साथ,
समय बिताती हूँ अपने साथ
हाँ मैं एक चोर हूँ
चुराती हूँ हर रोज
थोड़ा थोड़ा समय
अपने अपने और
सिर्फ अपने लिए.

रविवार, 1 अप्रैल 2012

समय का दर्द


समय का दर्द 
मैं समय हूँ
मैं बलवान हूँ,
बदलता रहता हूँ
घाव भर देता हूँ
कभी अच्छा, कभी बुरा
कभी किसी के लिए ठहरता नहीं
ये उपमाएं दी हैं मुझे, तुम ही लोगों ने
पर मैं क्या और कैसा हूँ
कोई नहीं जानता
मेरे सिवाय
न उठ जाये लोगों का विश्वास मुझसे
उतरने को उन पर खरा
क्या क्या न किया मैंने.
सच तो ये है कि मेरे भी दो चेहरे हैं
मैं अधीर हूँ
दूसरों के दर्द कम करते,
घाव भरते,
मैं स्वयं न भरने वाला
एक घाव हो गया हूँ
जिधर देखो
घाव ही घाव
दर्द ही दर्द
कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे
कितना-कितना भरूं
मैं घाव, दुःख, दर्द, परेशानियों का
अथाह सागर हो गया हूँ
मैं अब ठहरना चाहता हूँ
रुकना चाहता हूँ
थम जाना चाहता हूँ.

रविवार, 4 जुलाई 2010

समय


समय




असमय ही,

समय के कुछ पल बह गए थे.


सहेजा बहुत,

सो कुछ रह गए थे.


एक समय था,

समय से मेरी अंजुरी भरी थी.

पर समय, तो समय से,

सरकता रहा.

मैं सोती रही,

वो खोता रहा.

नींद से जागी,


जब सबेरा हुआ,



पर अंजुरी थी खाली,


वो न मेरा हुआ.


सहेजे बहुत मैंने,


बहके हुए पल


पर,


समय पर,


समय को बनाना न आया.

जो छूटा था पीछे,

उसको लाना न आया.


सभी को नचाया,

इशारे पे अपने


पर शायद

समय को नचाना न आया.





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