रविवार, 18 दिसंबर 2011

बाल कवितायेँ


आज दो कवितायेँ बच्चों के लिए 
(१)
हँसना

हँसना और हँसाना सीखो 
हर पल तुम मुस्काना सीखो. 
कली कली से फूल फूल से 
खुशबू तुम महकाना सीखो.
इस प्यारी सी धरती को  
सूरज सा चमकाना सीखो. 
अपनी धरती के दुश्मन को 
दुनिया से पार लगाना सीखो. 
हँसना और हँसाना सीखो  
हर पल तुम मुस्काना सीखो. 
(२)

                                                                धरती माँ



धरती माँ के वीर सिपाही 
इतना तो बतला देंगे. 
दुश्मन की हो बुरी नज़र 
तो उसको पाठ पढ़ा देंगे
                       
                              

धरती माँ के हर कोने में 
खुशियाँ हम बिखरा देंगे. 
खुशिओं पर जो ग्रहण लगाये
उसको मज़ा चखा देंगे.
                                                              



धरती माँ की बगिया में 
हम सुंदर फूल खिला देंगे. 
इन फूलों को जो मसलेगा 
उसको सही सजा देंगे. 
                       
धरती माँ की ताकत को 
                       दुनिया के आगे कर देंगे. 
                       इसको जो ना माने तो 
                          उसको भी सबक सिखा देंगे. 
                  
धरती माँ के वीर सिपाही 
इतना तो बतला देंगे. 
दुश्मन की हो बुरी नज़र 
तो उसको पाठ पढ़ा देंगे.

रविवार, 11 दिसंबर 2011

मुन्तज़िर


मुन्तज़िर

(1)
आज फिर सब मेरी आँखों के सामने से गुजरा 
वही सर्द मौसम वही ज़र्द चेहरा. 
खुशियाँ पुरबहार पर हवाओं पर पहरा 
यहीं आके कभी वसंत था ठहरा. 
कभी   यहीं पर बंधा था 
मेरे सर जीत का सेहरा. 
आज यहीं है खौफ 
और मौत सा कुहरा 
जिसे देख कर मेरा जिस्म है सिहरा.

(2) 
लम्बे  होने लगे आज फिर ये मौत के साए,
इन बेबाक आँखों में ये बेखौफ से आये.
ये शबनमी बिछौना अब दर्द की दास्तान हो गया, 
ये मखमली चदरा आज शरीरे कफ़न हो गया. 
(3) 
मेरे दर पे आने से पहले दस्तक दिया करो,   
जब तक मैं न कहूँ यूँ ही खड़े रहा करो. 
तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो, 
तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो. 

रविवार, 4 दिसंबर 2011

इमारतें


इमारतें 

हमारे शहर की 
बुजुर्ग जर्जर खस्ताहाल इमारतें.    
कंपकंपाती हुई झुकी हुई.
फिर भी खड़ी हैं 
दम साधे डर के साये में  
कि कहीं आ न जाए 
कोई तेज हवा का झोंका. 
और ढह जाएँ वो 
और उनका इतिहास 
नहीं ...
मरने से नहीं डरतीं वो. 
डरतीं हैं इतिहास बनने से
कि इस शहर में 
कोई भी नहीं जीता 
भूत में वर्तमान में 
हर कोई जीता है भविष्य में 
और इन इमारतों का कोई भविष्य नहीं.

रविवार, 13 नवंबर 2011

चाय


चाय


तुम्हारी भूरी आँखों से झरती 

वो गोल दानेदार शरारत
चाय के पानी सी उबलती मेरी सांसें.  
शहद के दो बूंद सी
उसमें मिलती तुम्हारी सांसें 

और नींबू की बूंद का एक कतरा भी नहीं.. 
बस नीबूं की फांक से 
तुम्हारे अधर
और मैं ...
चमक उठी, खिल उठी 
सुनहरी हो गयी.

रविवार, 6 नवंबर 2011

चाँद

चाँद 
इस करवा चौथ
मैंने भी व्रत रखा 
निर्जला औरों की तरह.
रात सबने चाँद को पूजा 
और चली गयीं
अपने अपने चाँद के साथ 
अपने अपने चाँद के पास.
अकेला रह गया 
आस्मां का वह चाँद और
मैं...
मैंने उसे बुलाया 
अपनी दोनों हथेलियों के बीच
कस कर उसे भींचा    
दोहरा किया और छुपा लिया 
तकिये के नीचे.
सोने की नाकाम कोशिश 
पर न जाने कब 
चाँद सरक गया 
रह गयी तो बस 
गीली हथेलियाँ और तकिया. 
नहीं जानती 
मेरी आँखों के समंदर में 
सैलाब आया था 
या रात चाँद बहुत रोया था 
हाँ पर सूरज 
जरुर मुस्कुरा रहा था.

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

दिले नादाँ...

दिले नादाँ...
जब से जाना है 
कोलेस्ट्राल की घनी मोटी परतों ने
मेरे शरीर में डेरा डाला है,
धमनिओं में एक अजीब सी
सिहरन और मीठा अहसास है.
तेरी तस्वीर, 
तेरी याद, 
तेरी बात,
सब उन परतों के पीछे
जो छुपा रखी है.
अब दुनिया की कोई एंजियोप्लास्टी
तुम्हें मुझसे अलग नहीं कर सकती
मेरे मरने तक
और मेरे मरने के बाद भी.  

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

रोशनी


रोशनी

आओ रोशनी के त्यौहार में
इस बार ये कसम खाएं.
भूकंप, आतंक से सहमी दिशाओं पे,
प्यार और शांति का मलहम लगाएं.
देखें धुएं और शोर से फिर कहीं
बहरी न हो जाएँ दिशाएं.
हमारे दियों की रोशनी को
अँधेरे बस यूँ ही न निगल जाएँ.
बेवजह जम गए रिश्तों को
फिर मोम सा पिघलाएं,हिलाएँ, मिलाएं.  
निराश मायूस बैठे न रहें,
हंसी ठहाकों के बम और रॉकेट चलायें.
चेहरे पे आतिशबाजी की छटा
मन में आशा के माहताब जलाएं.
बिजली से न करें रोशनी
किसी मासूम का चेहरा रोशन कराएँ.
आओ रोशनी के त्यौहार में
इस बार ये कसम खाएं
इस बार कुछ अलग सी दिवाली मनाएं.



आप सब के लिये ये रोशनी का त्यौहार, इस बार एक फिर से नयी रोशनी लेकर आये, दीवाली की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनायें. 

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

तन्हाई


तन्हाई



कभी फुर्सत में देखती हूँ 
अपने घर से 
पीछे वाले घर की 
एक विधवा दीवार. 
तनहा 
अधमरा पलस्तर 
दरकिनार हो चुका उससे.
शांत, उदास, मायूस 
अपने साथ जुड़े घर की तरह.
मिलने जुलने वालों में, 
दुख बाँटने वालों में 
बची है तो बस 
एक हवा और धूप. 
देखती हूँ 
अचानक बरसात के बाद  
घर का तो पता नहीं
पर दीवार बहुत खुश है. 
नए मेहमान जो आये हैं 
कुछ नन्ही पीपल की कोपलें, 
नन्ही मखमली काई 
और फिर 
उनसे मिलने वाले नए आगंतुक  
तितली, चींटीं, कीड़े, मकोड़े, 
कुछ उनके अतिथि 
गौरय्या, कबूतर 
और न जाने कौन कौन ...
खूब चहल पहल है. 
घर का तो पता नहीं 
पर हाँ! दीवार बहुत खुश है.
सोचती हूँ 
पर कितने दिन ....  

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

बतकही


बतकही 


घर की छत पर रखे 
अचार, पापड़ और बड़ियाँ 
मायूस थे.
पास की छत पर पसरी 
ओढ़नी और अम्मा की साड़ी
धीमे धीमे बतिया रहे थे.
इतनी देर हो गयी, 
कहाँ रह गयी वो ..
आचार, पापड़ और बड़ियों ने 
अपनी अनभिज्ञता जताई,
पडोसी छत से गुहार लगाई
रुमाल ने छोटे शरीर की दुहाई दी.
तो अम्मा की साड़ी ने 
बढती उम्र की. 
आखिर निकलना ही पड़ा ओढ़नी को
कुछ दूर ही उड़ी. 
एक पेड़ की डाल पे,
बादल की छावं में
एक सफ़ेद सुनहरा देहावरण झूलता पाया.
कुछ अनहोनी की आशंका से दिल धड़का. 
अगले ही पल 
पास के पहाड़ की ओट से 
आती कुछ आवाजें.
जाकर देखा. 
अपने स्वभाव के विपरीत 
रुपहले गोटे वाले मटमैले घाघरे 
तिस पर
काले कांच सी पारदर्शी चुनर में उसे... 
लौट आई ओढ़नी..
चेहरे पे शरारत देख 
खीजी और बोल उठी साड़ी
अरे! ऐसा क्या देख आई...
दोनों हाथों से चेहरा छुपा के वो बोली
आज मैंने सांवले, 
मजबूत कद काठी वाले
बलिष्ठ पहाड़ की बाँहों में 
लिपट लिपट कर 
धूप जीजी को नहाते देखा है,  
सो आज न आयेंगी जीजी.

(चित्र दार्जीलिंग के पहाड़ों का मेरे खजाने से) 

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

शहर


शहर 

इस शहर में हर शख्स
बारूद ले के चलता है,
मुंह खोलते बारूद झरता है
उड़ती हैं धज्जियाँ 
अरमानों की यहाँ हर दिन,  
चिथड़े कोई
यहाँ गिनता नहीं, 
रखता नहीं.
गिरह खुल जाए रिश्तों की, 
दिल की कभी, 
सीवन उधड़ जाये 
दिल के दरों दीवार की, घर की 
फेंक दो, दफन कर दो, 
मेरे शहर में अब रफूगर मिलता नहीं.

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