इमारतें
हमारे शहर की
बुजुर्ग जर्जर खस्ताहाल इमारतें.
कंपकंपाती हुई झुकी हुई.
फिर भी खड़ी हैं
दम साधे डर के साये में
कि कहीं आ न जाए
कोई तेज हवा का झोंका.
और ढह जाएँ वो
और उनका इतिहास
नहीं ...
मरने से नहीं डरतीं वो.
डरतीं हैं इतिहास बनने से
कि इस शहर में
कोई भी नहीं जीता
भूत में वर्तमान में
हर कोई जीता है भविष्य में
और इन इमारतों का कोई भविष्य नहीं.
