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रविवार, 2 अक्टूबर 2011

शहर


शहर 

इस शहर में हर शख्स
बारूद ले के चलता है,
मुंह खोलते बारूद झरता है
उड़ती हैं धज्जियाँ 
अरमानों की यहाँ हर दिन,  
चिथड़े कोई
यहाँ गिनता नहीं, 
रखता नहीं.
गिरह खुल जाए रिश्तों की, 
दिल की कभी, 
सीवन उधड़ जाये 
दिल के दरों दीवार की, घर की 
फेंक दो, दफन कर दो, 
मेरे शहर में अब रफूगर मिलता नहीं.

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