आसरा
दूर से निहारती हूँ तुम्हें.
सुना है,
गुणों का अकूत भंडार हो तुम.
वैसे, हूँ तो मैं भी.
तुम में भी एक दोष है,
और मुझ में भी.
तुम्हारा असह्य कड़वापन,
जो शायद तुम्हारे लिए राम बाण हो
और मेरा, दुर्बल शरीर.
मुझे चाहिए,
एक सहारा सिर्फ रोशनी पाने के लिए.
सोचती हूँ फिर क्यों न तुम्हारा ही लूँ.
अवगुण कम न कर सकूँ तो क्या,
गुण बढ़ा तो लूँ.
आओ हम दोनों मिलकर
कुछ नया करें.
किसी असाध्य रोग की दवा बनें.
दूर से निहारती हूँ तुम्हें,
जानती हूँ, मैं अच्छी हूँ,
पर बहुत अच्छी बनना चाहती हूँ.
कहते हैं,
नीम पर चढ़ी हुई गुर्च बहुत अच्छी होती है.
बोलो! क्या दोगे मुझे आसरा,
अपने चौड़े विशाल छतनार वक्षस्थल पर?
ऊपर के चित्र में नीम के पेड़ से लटकती जड़ें गुर्च की हैं. गुर्च को अंग्रेजी में टिनोस्पोरा कहते हैं. नीचे का चित्र गुर्च का है. यह एक औषधीय पौधा है. इसके कुछ और नाम इस प्रकार हैं:
छिन्ना chinna, छिन्नरूहा chinnaruha, गिलोय giloy, गुड़च gudach, गुलञ्च gulancha, गुलुञ्च guluncha, गुलबेल gulbel, गुर्च gurch, जीवन्ती jivanti, जीवन्तिका jivantika, पित्ताग्नी pittagni, तिक्तपार्वण tiktaparvan, वज्रा वज्र.
(दोनों चित्र गूगल से लिए गए हैं)