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रविवार, 30 अक्टूबर 2011

दिले नादाँ...

दिले नादाँ...
जब से जाना है 
कोलेस्ट्राल की घनी मोटी परतों ने
मेरे शरीर में डेरा डाला है,
धमनिओं में एक अजीब सी
सिहरन और मीठा अहसास है.
तेरी तस्वीर, 
तेरी याद, 
तेरी बात,
सब उन परतों के पीछे
जो छुपा रखी है.
अब दुनिया की कोई एंजियोप्लास्टी
तुम्हें मुझसे अलग नहीं कर सकती
मेरे मरने तक
और मेरे मरने के बाद भी.  

रविवार, 22 मई 2011

मेरे एहसास


मेरे एहसास 
(1)

कभी पट गयी थीं धमनियां मेरी,
अवसाद के कोलेस्ट्राल से, 
जब से तुम आये,  
सबेरे की सैर, 
वो मिश्री घोलता संगीत. 
हर पल अपने पल का अहसास,
तुम्हारी मीठी बातों में,
कोलेस्ट्राल तो घुल गया
अब शायद मेरी बारी है .....

(2)

कभी दिल जोरों से धड़क जाता था,
उनके आने पर, 
और कभी उनके न आने पर. 
कभी सांसे बेतरतीब हो जाती थीं.
उनसे नज़र मिल जाने पर, 
या फिर बिछड़ जाने पर.
कभी दिल दिमाग अनियंत्रित हो जाता था.
उनका स्पर्श पाने पर, 
या कभी उसका अहसास हो जाने पर, 
अब सब नियंत्रित है 
अब तो लगता वही मुझे मेरा पेस मेकर है,  
उन मजबूत बाहों से लिपट जाने पर.  
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