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रविवार, 16 दिसंबर 2012

भविष्य


भविष्य 
हर दिन  सुबह सवेरे
बनाती हूँ जब चाय
देखती हूँ गर्म पानी के इशारे पे नाचती
चाय की पत्ती
उसका दिल जीतने का
हर संभव प्रयास करती
इतराती, इठलाती, बलखाती,
झूम झूम जाती
तब तक
जब तक बंद नहीं कर देती मैं आंच
जब तक खो नहीं जाता
उसका रूप, रंग, यौवन
सुडौल सुन्दर दानों की जगह
बेडौल थुल थुल काया
फिर बैठ जाता है
पत्तियों का झुण्ड
बर्तन की तली पर
थका, हारा, हताश,
फिर भी शांत.
दूर कर देती हूँ फिर मैं
पत्ती को उसी के पानी से.
सोचती हूँ कहीं
स्त्रीलिंग होने मात्र से
उसका भाग्य स्त्रियों से
जुड़ तो नहीं जाता
नहीं चाहती हूँ उसे
उसी की किस्मत पे छोड़ना
कूड़े के ढेर पर पड़े पड़े खत्म होना
उठाती हूँ बड़े जतन से उसे
ले जाती हूँ अपने सबसे प्यारे
और दुर्बल पौधे के पास
मिलाती हूँ उसकी
सख्त मिटटी में इसे
खिल उठती है वो मिटटी
भुर भुरी हो उठती है
आश्वस्त हूँ अब
जी उठेगा मेरा पौधा
जाते जाते कोई
जीवन दान जो दे गया है उसे.

रविवार, 9 दिसंबर 2012

मौन निमंत्रण

मौन निमंत्रण

ये मेरा है मौन निमंत्रण, आज तुम्हें अजमाने को,
जब मैं पहुंचा देर शाम को, खेतों औ खलिहानों को.

तेरी साँसे पास न आयीं, मेरा दिल बहलाने को,
सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ, तुम्हे खींच कर लाने को.

तुम क्या जानो,मुझ पागल, प्रेमी,बेचारे,दीवाने को,
मेरी बाहें मचल रही हैं, तुम्हें पास ले आने को.

सोच रहा हूँ,आलिंगन कर, मजबूर करूं सकुचाने को,
सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ, तुम्हे खींच कर लाने  को.

मेरी ऑंखें तरस रही हैं, इक दरस तुम्हारा पाने को,
सूखे अधरों पर प्यास खिली, क्या प्यासे ही रह जाने को.

क्यों पास नहीं तुम आ जाती, मधुशाला छलकाने को,
सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ, तुम्हे खींच कर लाने को.

मैंने तो भेजा था तुमको, मेरा दिल ले जाने को,
मेरे दिल से दिल न मिले तो, मजबूर नहीं लौटने को.

याद न मेरी आएगी, अब तेरा दिल भरमाने को,
सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ, तुम्हें भूल कर आने को.

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

शहर


शहर 

इस शहर में हर शख्स
बारूद ले के चलता है,
मुंह खोलते बारूद झरता है
उड़ती हैं धज्जियाँ 
अरमानों की यहाँ हर दिन,  
चिथड़े कोई
यहाँ गिनता नहीं, 
रखता नहीं.
गिरह खुल जाए रिश्तों की, 
दिल की कभी, 
सीवन उधड़ जाये 
दिल के दरों दीवार की, घर की 
फेंक दो, दफन कर दो, 
मेरे शहर में अब रफूगर मिलता नहीं.

रविवार, 22 मई 2011

मेरे एहसास


मेरे एहसास 
(1)

कभी पट गयी थीं धमनियां मेरी,
अवसाद के कोलेस्ट्राल से, 
जब से तुम आये,  
सबेरे की सैर, 
वो मिश्री घोलता संगीत. 
हर पल अपने पल का अहसास,
तुम्हारी मीठी बातों में,
कोलेस्ट्राल तो घुल गया
अब शायद मेरी बारी है .....

(2)

कभी दिल जोरों से धड़क जाता था,
उनके आने पर, 
और कभी उनके न आने पर. 
कभी सांसे बेतरतीब हो जाती थीं.
उनसे नज़र मिल जाने पर, 
या फिर बिछड़ जाने पर.
कभी दिल दिमाग अनियंत्रित हो जाता था.
उनका स्पर्श पाने पर, 
या कभी उसका अहसास हो जाने पर, 
अब सब नियंत्रित है 
अब तो लगता वही मुझे मेरा पेस मेकर है,  
उन मजबूत बाहों से लिपट जाने पर.  

बुधवार, 4 नवंबर 2009

नागफनी





नागफनी


दिल को ग़म के गर्द औ गुबार और धुएँ से बचाने को ,हमने

दिल में एक बगिया लगा रखी है

फूल खिल के गुलाब के चार दिन को

बगिया को सूनी बना जाते हैं

दिल की बगिया में सावन लहलहाने को सदा, हमने

नागफनी ही लगा रखी है

खुशबू होती है गुलाब की चार दिन

औ इतर से भी पाई जा सकती है

याद रखने को दिल की चुभन ता उम्र, हमने

दिल में नागफनी की बाड़ लगा रखी है

जीने को गुलाब को चाहिए

एक खुशगावर माली हवा औ पानी

जीवित रखने को नागफनी को,हमने

दिल में हरारत औ आँखों में नमी छुपा रखी है

झड़ जाता है गुलाब इश्क की हवा से भी

मेरी नागफनी ने दिल में गहरे

अपनी जड़ें बिछा रखी हैं

सताने वालों मेरे भूल न पाऊं तुम्हें

सो तुम्हारी तस्वीर हर कांटे पे लगा रखी है

तुम क्या दोगे हमें जीने के सहारे

उधार की सांसों पे जीने वालों

हमने तो काँटों में भी महफ़िल सजा रखी है

डाली है हम पर भी बुरी नज़र फूलों ने यारों

ये तो कांटे हैं जिन्होंने अस्मत बचाए रखी है

दिल को ग़म के गर्द औ गुबार और धुएँ से बचाने को ,हमने

दिल में एक बगिया लगा रखी है
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