सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

वृत्त

वृत्त



एक वृत्त जिसकी त्रिज्या परिधि और व्यास

सतत गतिशील हैं

कभी फैल जाते हैं

अनंत दिशाओं तक

कभी सिमट कर समाहित जाते हैं

केंद्र बिंदु में

ये एक चमत्कारिक और अभिमंत्रित वृत्त है

अपने ही माथे पे एक लाल वृत्त संजोये

हमारे कहे अनकहे भय समझने की अद्भुत क्षमता

हमारे विस्थापन के साथ

पल पल घटता बढ़ता

उसका वात्सल्यमय परिधि सा आंचल

हमें पुकारती परस्पर विपरीत

दिशाओं में फैली व्यास सी बाहें

कभी अपनी बाँहों में भरने को तत्पर

कभी सामने उठी हुई समान्तर त्रिज्या सी

अर्ध वृत्त बनाते हुए भी

सम्पूर्णता की परिचायक बाहें

कभी अपने अंक में भर

सम्पूर्ण वृत्त को केन्द्रीभूत कर

सत्यापित करता अपने अस्तित्व को

मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे

जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त

जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है

हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है.

चित्र गूगल से साभार

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

वारे- न्यारे

वारे- न्यारे



धरती पे हम हैं भारी

और अंबर पे बदरा कारे.

अब तो अंबर भी चल रहा है,

आतंक के सहारे!!!

लूट, हत्या और फिरौती बिन,

अब वो भी हैं बेसहारे.

वाह!!!  हमसे ही है सीखा

और हमारे ही वारे न्यारे.

तुम्हें किसने दी सुपारी ?

ये किसके हैं इशारे.

क्यों अगवा किये हैं तुमने

मेरे सूरज, चाँद, तारे?

छुपते फिरते हैं तुमसे

रश्मि, किरण, चांदनी बेचारे

विस्फोटकों से भरे घन ने

धरती पे घर उजाड़े

है क्या गुनाह उनका

क्यों बेगुनाह मारे?


शपथ

लौटा दो मेरा सूरज

तुम जो कहो वो करेंगे

फिरौती में जो तुम मांगो

तुम्हारे आगे वो धरेंगे

प्रकृति का अनादर

माँ! अब हम न करेंगे

लेंगे जो भी तुमसे

उसे वापस भी करेंगे.

रविवार, 26 सितंबर 2010

सवा सेर

सवा सेर




कुदरत से न डरने वाले घूम, रहे हैं शेर से
देखो आफत बरस रही है, अम्बर की मुंडेर से. 

जो कुछ भी जोड़ा सबने था, खून पसीना पेर के
देखो कैसे गटक रहा जल अन्दर बाहर घेर के.

सब कुछ बदल गया पलभर में,  नभ की एक टेर से    
बस्तियां हैं निकल रहीं, देखो मलबों के ढ़ेर से. 

जाने कितने पार हो गए, इस जीवन के फेर से 
देखो दिया  जवाब इन्द्र ने, सेर का सवा सेर से.

पूंछ रही है हम से प्रकृति, इक इक घाव उकेर के 
देखो!  जान गए न तुम अब, क्यों  आया सावन देर से. 

रविवार, 19 सितंबर 2010

आशा

आशा



जाने कितनी रातों को

छुप छुप कर, हम भी रोये हैं

जीवन में हमने भी अपने

बबूल से दिन ढोए हैं

फूलों का कभी साथ न पाया

काँटों में जखम पिरोये हैं

जाने कैसे कितने घाव

इन्हीं आँखों से धोए हैं

टूटे हुए मरहम के धागे भी

आज तक संजोए हैं

वयोवृद्ध अहसास हमारे

अब तक ताके पर सोये हैं

सूखे हुए आशा के बीज

अब अरमानों में भिगोए हैं

धरा पर तो जगह नहीं है

अंबर में सपने बोये हैं

रविवार, 12 सितंबर 2010

मिलन

  आओ इस हिंदी दिवस पर अंग्रेजी का बहिष्कार न करके उसे ढूध में चीनी की तरह मिला के देखें एक प्रयोग


मिलन




मैंने सीखा है suffer ........ करना

जीवन के इस छोटे से सफ़र से

सौ बार तुझे चाहा पर

रही bar... मैं तेरे असर से

ढूंढा तुझे बहुत, ऑंखें हुई न चार

बुझ गये मन के दीप,

मन मंदिर भी हुआ char..
.
क्या क्या विघ्न पार करके

अब पहुंची हूँ तेरे par .........

मेरे मन की डोर आ लगी है

आज तेरे door .....से

मिल गया है संकेत मुझे

कुछ मेरी ओर से कुछ तेरी ore....से

पोर पोर महका है मेरा

किया है जब तूने प्यार pour .....

नाचे है मन मोर मेरा

और मांगे है ये more .......

पलकों की कोर से बही मैं

पहुंची तेरे दिल के core....

सदियों से पल रहा था
जो मेरे मन में शोर
मिल गया है आज उसको

वो मन चाहा shore.....

रविवार, 5 सितंबर 2010

प्रेमिका

प्रेमिका

एक प्रेमिका हूँ मैं

हर पल तुम्हारा  और

तुम्हारे स्पर्श का साथ

कितने  अधीर हो उठते

तुम मेरे बिन

फिर तुम्हारी उँगलियों पर

 थिरकती मैं

 तुम्हारे अधर  पर विराजती

 तुम्हारी सांसों में घुलती मेरी सांसें

और मैं

जलती, मचलती, बिखरती

मिटती धुआं होती,

कितना अभिशप्त जीवन है मेरा!!!!!

जिस किसी ने  भी चाहा मुझे

उस ने यूँ ही मिटा दिया मुझे

फिर भी मन मुदित है

जानती हूँ

त्यजे, जाने कितने ही जीवन

मैंने जिसके लिए

त्यजेगा वो भी, एक दिन

अपनी सांसें मेरे लिए

तब होगी पूर्णाहुति मेरे प्रेम की

आखिर सिगरेट जो हूँ मैं



रविवार, 29 अगस्त 2010

सूरजमुखी

सूरजमुखी

  

बन के सूरजमुखी, तकती रही ताउम्र जिसे,

वो मेरा सूरज नहीं किसी और का चाँद निकला.



जब भी देखी तितलियाँ रंग बिरंगी उसने,

दिल धड़का, उछला, मचला सौ बार निकला.


 
मुझ पर न पड़ी मुहब्बत भरी नज़र उसकी,

ये शायद मेरी ज़र्द रंगत का गुनाह निकला.

 

इस क़दर ज़ुल्म ढाए हैं उसने मुझ पर,

पर दिल की बस्ती से वो आज भी बेदाग़ निकला.

 

दोष क्या दें बादलों को सूरज ढांपने का,

हाय! जब अपनी किस्मत में ही दाग़ निकला.



खड़े हैं आज भी मुंह उठाये तेरी ओर,

पर तू तो चलता फिरता इक बाज़ार निकला.


कभी तो रखेगा तू, दो जलते हुए हर्फ़ मेरी पंखुरी पे,

इसी हसरत में ये सूरजमुखी हर बार निकला.


रविवार, 22 अगस्त 2010

परिणिति

परिणिति  



हम यानि मैं और तुम

कितने खुश थे

मैं मदमस्त तुम आश्वस्त

तुम सदा ही अपनी बाहें फैलाए

मैं उनमें

लिपटती, झूलती,फिसलती

उनके बीच से निकलती

सारा सारा दिन अठखेलियाँ करती

कभी दूर जा बैठती

ये सोच की आज तुम्हे बहुत सताया

फिर अगले पल तुम्हें मायूस

अपनी ओर बाहें फैलाये देख

आ जाती खनकती हुई तुम्हारी परिधि में

याद है हमारे प्रणय की वो परिणिति

और कुछ रौशन गाँव

हमारे प्रेम की छाँव में

पढ़ता नन्हा ननकू

हमारी प्रणय परछाई

और अँधेरे में सहारा पाती एक माई

कितने खुश थे हम

याद आया ..........

जब तुम पवन चक्की और मैं हवा हुआ करते थे

रविवार, 15 अगस्त 2010

सफ़र


सफ़र






कुछ भी तो नहीं बदला

रस्ते पर के ठूंठ

हर ठूंठ की छाँव में सुस्ताती धूप.

पानी की एक एक बूंद को तरसती

समंदर में एक सीपी

कहीं कोठरी में सुबकता बचपन

कहीं बचपन में पनपता यौवन

कुछ भी तो नहीं बदला

देह में धधकता दावानल

बयार में घुलता गंधक

आँखों में तरता तेज़ाब

ये सिर्फ शब्द नहीं

कुछ न कह पाने की व्यथा है

कहते हैं

देश ने प्रगति की है

निर्धन निरीह और निर्बल

आज भी वहीँ हैं

आज से तिरसठ साल पहले

छोड़ आई थी जहाँ.




रविवार, 8 अगस्त 2010

जल प्रपात


" जल प्रपात" 




मेरे नैनों के जल प्रपात से, 
किंचित,गंधक के सोते सा 
पवित्र औषधीय जल बहता  है 
कितना व्यथित किया सबने, मुझे 
ये पावन नीर बहाने  को 
कोई निहारे खुश हो जाये 
कोई डिबिया भर घर ले जाये 
कोई पाप उतारे, कोई पांव पाखरे 
कोई भात बनाए, अपनों में बांटे  
कोई कलह उबाले, फिर छींटे मारे  
ये जग खारे जल से पोषित  
पर  मेरे दृग  दो  बूंद  न  आया  
सौ बार  मुझे यदि  जनम  मिले  तो  
मुझको  दरिया  जल में  देना  
मैं  बहूँ,  मेरे नैन  बहें
खारा पन दिन रैन रहे  
जीवन में कुछ चैन रहे  
फिर चाहें, सारा  जग  बेचैन रहे   




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