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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

वारे- न्यारे

वारे- न्यारे



धरती पे हम हैं भारी

और अंबर पे बदरा कारे.

अब तो अंबर भी चल रहा है,

आतंक के सहारे!!!

लूट, हत्या और फिरौती बिन,

अब वो भी हैं बेसहारे.

वाह!!!  हमसे ही है सीखा

और हमारे ही वारे न्यारे.

तुम्हें किसने दी सुपारी ?

ये किसके हैं इशारे.

क्यों अगवा किये हैं तुमने

मेरे सूरज, चाँद, तारे?

छुपते फिरते हैं तुमसे

रश्मि, किरण, चांदनी बेचारे

विस्फोटकों से भरे घन ने

धरती पे घर उजाड़े

है क्या गुनाह उनका

क्यों बेगुनाह मारे?


शपथ

लौटा दो मेरा सूरज

तुम जो कहो वो करेंगे

फिरौती में जो तुम मांगो

तुम्हारे आगे वो धरेंगे

प्रकृति का अनादर

माँ! अब हम न करेंगे

लेंगे जो भी तुमसे

उसे वापस भी करेंगे.

रविवार, 19 सितंबर 2010

आशा

आशा



जाने कितनी रातों को

छुप छुप कर, हम भी रोये हैं

जीवन में हमने भी अपने

बबूल से दिन ढोए हैं

फूलों का कभी साथ न पाया

काँटों में जखम पिरोये हैं

जाने कैसे कितने घाव

इन्हीं आँखों से धोए हैं

टूटे हुए मरहम के धागे भी

आज तक संजोए हैं

वयोवृद्ध अहसास हमारे

अब तक ताके पर सोये हैं

सूखे हुए आशा के बीज

अब अरमानों में भिगोए हैं

धरा पर तो जगह नहीं है

अंबर में सपने बोये हैं
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