वारे- न्यारे
धरती पे हम हैं भारी
और अंबर पे बदरा कारे.
अब तो अंबर भी चल रहा है,
आतंक के सहारे!!!
लूट, हत्या और फिरौती बिन,
अब वो भी हैं बेसहारे.
वाह!!! हमसे ही है सीखा
और हमारे ही वारे न्यारे.
तुम्हें किसने दी सुपारी ?
ये किसके हैं इशारे.
क्यों अगवा किये हैं तुमने
मेरे सूरज, चाँद, तारे?
छुपते फिरते हैं तुमसे
रश्मि, किरण, चांदनी बेचारे
विस्फोटकों से भरे घन ने
धरती पे घर उजाड़े
है क्या गुनाह उनका
क्यों बेगुनाह मारे?
शपथ
लौटा दो मेरा सूरज
तुम जो कहो वो करेंगे
फिरौती में जो तुम मांगो
तुम्हारे आगे वो धरेंगे
प्रकृति का अनादर
माँ! अब हम न करेंगे
लेंगे जो भी तुमसे
उसे वापस भी करेंगे.

