आशा
जाने कितनी रातों को
छुप छुप कर, हम भी रोये हैं
जीवन में हमने भी अपने
बबूल से दिन ढोए हैं
फूलों का कभी साथ न पाया
काँटों में जखम पिरोये हैं
जाने कैसे कितने घाव
इन्हीं आँखों से धोए हैं
टूटे हुए मरहम के धागे भी
आज तक संजोए हैं
वयोवृद्ध अहसास हमारे
अब तक ताके पर सोये हैं
सूखे हुए आशा के बीज
अब अरमानों में भिगोए हैं
धरा पर तो जगह नहीं है
अंबर में सपने बोये हैं
