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सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

वृत्त

वृत्त



एक वृत्त जिसकी त्रिज्या परिधि और व्यास

सतत गतिशील हैं

कभी फैल जाते हैं

अनंत दिशाओं तक

कभी सिमट कर समाहित जाते हैं

केंद्र बिंदु में

ये एक चमत्कारिक और अभिमंत्रित वृत्त है

अपने ही माथे पे एक लाल वृत्त संजोये

हमारे कहे अनकहे भय समझने की अद्भुत क्षमता

हमारे विस्थापन के साथ

पल पल घटता बढ़ता

उसका वात्सल्यमय परिधि सा आंचल

हमें पुकारती परस्पर विपरीत

दिशाओं में फैली व्यास सी बाहें

कभी अपनी बाँहों में भरने को तत्पर

कभी सामने उठी हुई समान्तर त्रिज्या सी

अर्ध वृत्त बनाते हुए भी

सम्पूर्णता की परिचायक बाहें

कभी अपने अंक में भर

सम्पूर्ण वृत्त को केन्द्रीभूत कर

सत्यापित करता अपने अस्तित्व को

मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे

जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त

जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है

हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है.

चित्र गूगल से साभार
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