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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नववर्षागमन


नववर्षागमन
आओ खाएं सौगंध, करें तैय्यारी.
तैय्यारी नववर्षागमन  की.
आन पड़ी है आवश्यकता
अब तो नव बीज वपन की
बदले आचारण अपना, छोड़ दें
आदत स्वस्तवन की
करें लहूलुहान आस
आज हर मलिन मन की.
बन जाएँ आंधी इस बार
दरिंदगी दमन की.
न रहे ये शब्द अब शब्द कोष में.
यही चाहत है आहत मन की
आओ खाएं सौगंध, करें तैय्यारी.
तैय्यारी नववर्षागमन की
आओ खाएं सौगंध, करें तैय्यारी.
तैय्यारी नववर्षागमन की.
करें जतन बदल दें दिशा
समाज के आचरण की
फले फूले समाज
न रहे जगह व्याभिचरण की.
दें सम्मान, करें रक्षा,
प्रकृति, धरती, माँ, बहन की
न मैं, न तू, बनें हम.
हो शुरुवात यही संचलन की
उतार दें हर देनदारी
पुराने हर दारुण क्षण की
आओ खाएं सौगंध, करें तैय्यारी
तैय्यारी नववर्षागमन की.

रविवार, 15 मई 2011

जन्म-जन्मान्तर


जन्म-जन्मान्तर 



इस दुनिया से जाने के नाम पर
डर, 
मरने का नहीं, 
बिछुड़ने का है 
अगला जन्म, 
मनुष्य योनी में,
मिलना जरूरी तो नहीं.
फिर 
हमारी जन्म जन्मान्तरों तक,
साथ निभाने वाली कसमों का क्या ?
चलो 
आज भगवान से प्रार्थना करें, 
हमें प्लास्टिक ही बना दें
पड़े रहेंगे सदियों तक जैसे के तैसे.
पर ये क्या .....
प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता.
ये प्रार्थना वापस,
फिर,
भगवान,
हमें कागज़ ही बना देना.
रिसायकिल हो हो कर ही सही 
कुछ जन्म तो  निकाल ही  लेंगें, 
एक ही योनी में.
सात  जन्म न सही, 
कुछ जन्मों का साथ तो मिले.  
आज के अनिश्चित जीवन में.

रविवार, 3 अप्रैल 2011

एक प्रश्न

एक प्रश्न



जब तब बहस छिड़ती है,
कहते हैं स्त्री कमज़ोर है. 
पुरुष से शारीरिक रूप से. 
क्या करें प्रकृति से ही 
सब कुछ कम पाया है. 
आकार छोटा, मांस पेशियाँ कम.   
शक्ति कम, गुरुत्व केंद्र भी नीचा. 
यहाँ तक कि दि....ल .....भी छोटा. 
बड़ा कुछ है, तो वो  है फेफड़ा, 
और इस नन्हे से दिल  की धडकनें. 
तुम्हारे बड़े दिल से कहीं ज्यादा.  
ये सब मैं नहीं कह रही हूँ,
सत्यापित हो चुका है ये. 
मेरे फेफड़ों  में आवारा फिरती इक इक साँस,
सिर्फ  तुम्हारे लिये ही जीती है.
मेरी हर धड़कन में बस तुम ही हो 
और तुम्हारी धड़कन में .....???
कौन बड़ा लगता है तुमको ?   
छोटे दिल वाली मैं या बड़े दिल वाले तुम.
आखिरी निर्णय भी तुम्हारा ही मान्य है मुझे .
तुम्हारी प्रतिक्रिया में प्रतीक्षारत ......   
तुम्हारी मैं .  

रविवार, 26 सितंबर 2010

सवा सेर

सवा सेर




कुदरत से न डरने वाले घूम, रहे हैं शेर से
देखो आफत बरस रही है, अम्बर की मुंडेर से. 

जो कुछ भी जोड़ा सबने था, खून पसीना पेर के
देखो कैसे गटक रहा जल अन्दर बाहर घेर के.

सब कुछ बदल गया पलभर में,  नभ की एक टेर से    
बस्तियां हैं निकल रहीं, देखो मलबों के ढ़ेर से. 

जाने कितने पार हो गए, इस जीवन के फेर से 
देखो दिया  जवाब इन्द्र ने, सेर का सवा सेर से.

पूंछ रही है हम से प्रकृति, इक इक घाव उकेर के 
देखो!  जान गए न तुम अब, क्यों  आया सावन देर से. 

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