रविवार, 9 मई 2010

दरख़्त


दरख़्त




मैं बाहर से सख्त होना चाहती हूँ.

त्यज कर सारी कुटिलता,

ओढ़ कर मुख पे जटिलता,
 
आश्वस्त होना चाहती हूँ.
 
मैं एक दरख़्त होना चाहती हूँ.
 
उजड़ गए जो कुछ घरोंदे,
 
सांसों में रहते थे मेरे,
 
बिखरे हुए सारे सिरे.
 
फिर जोड़ देना चाहती हूँ.
 
बीते हुए दुःख दर्द सारे,
 
रीते हुए पल छिन हमारे,
 
निश्वासों के सहारे, 
 
पतझड़ में,
 
खो देना चाहती हूँ.
 
रेशमी धागों के नीड़,
 
उँगलियों की पोर पे,
 
फिर से सजाना चाहती हूँ.
 
मैं बसंत पाना चाहती हूँ.
 
जीवंत होना चाहती हूँ. 
 
आश्वस्त होना चाहती हूँ.
 
आसक्त होना चाहती हूँ 
 
मैं बाहर से सख्त होना चाहती हूँ.
 
हाँ, मैं एक दरख़्त होना चाहती हूँ.   
 
 
     

रविवार, 2 मई 2010

जलकुम्भी


जलकुम्भी





सड़क के किनारे

कच्ची मिटटी में

ठहरे पानी और नमी में

फैली ऐ जलकुम्भी !

पसर जाओ, मेरी आँखों में भी.

फैलाओ  

हरियाली का छद्मावरण.

सोख लो नमी.

इसके पहले कि  इन आँखों  से,

 सीली दीवारों से झरती

 चूने की पपड़ी की तरह,

वो सब कुछ झर जाये,

जिसे बस अपने तक ही,

सीमित रखने का प्रण लिया था कभी,

और दिखने लगे 

पपड़ी झरने के बाद के,

वो बदनुमा धब्बे.

न होने दो अहसास किसी को

यहाँ भी कभी यौवन से परिपूर्ण पर्यावरण था.

जो लांछन, दोषारोपण और छिद्रान्वेषण

के प्रदूषण के चलते.

सूख कर,

खारे पानी की,

चंद बूंदों में सिमट कर रह गया है.



रविवार, 25 अप्रैल 2010

विस्तार

विस्तार





मेरे नैनों के नीलाभ व्योम में,

एक चन्दा, एक बदली और

कुछ झिलमिल तारे रहते हैं.

सावन में,

जब घनघोर घटायें उमड़ घुमड़ कर,

आँखों में खो जाती हैं.

चन्दा, तारे सो जाते हैं.

वर्षों मरु थे, जो पोखर सारे,

स्वयमेव ही भर जाते हैं.

कभी शीत बहे तो,

चंदा, तारे ओढ़ दुशाला,

लोचन में सो जाते हैं.

दिग्भ्रमित हुए कुछ खग विहग.

जब दृग में वासंत मनाते हैं.

उषा किरण  की रक्तिम डोरें,

जाने अनजाने,

नख में उलझाते जाते हैं.

तब पलकों की झालर के कोनें  ,

आप ही खुल जाते हैं.

ओस के मोती सरक - सरक कर,

आंचल में भर जाते हैं.

गर्मी की,

तपती रातों में चख में खर उग आते हैं.

भीष्म की सी शर शैय्या में,

तब चंदा तारे अकुलाते हैं.

जाने क्या कुछ खोया मैंने,

ये झिलमिल तारे पाने को.

पर सावन रहा सदा नयनों में,

जाने क्यों मधुमास न आया.

अम्बर रहा सदा अंखियों में,

पर मैंने क्यों विस्तार न पाया!

मैंने क्यों विस्तार न पाया!!

रविवार, 18 अप्रैल 2010

राजनीति

राजनीति





राजनीति मेरे रग रग में बसी है

लूट, खसोट, सेंधमारी और क़त्ल करवाए मैंने.

फिर उन्हीं  के आशियाने भी बसवाये मैंने.

हर राजनीतिज्ञ की तरह  अपने इर्द गिर्द,

अभेद्य सुरक्षा आवरण भी रचाए मैंने.

हर सुरक्षा चूक की तरह,

यहाँ भी एक चूक हो गयी.

मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल हो गयी.

करवाती थी, लोगो से, लोगो के लिए, जो मैं.

अपने लिए अपने आप ही कर बैठी वो मैं.

तख्ता पलट गया मेरा.

मोहल्ले की संसद में मजबूर हो गयी मैं.

आम राजनेता की तरह, मायूस हो नहीं,

बड़े अभिमान से नैतिक जिमेद्दारी भी ले बैठी मैं.

आज तक कर रही हूँ,

अपनी भूल का प्रायश्चित मैं.

जो लोग किया करते थे,

कभी दर पर मेरे.

वो आमरण अनशन आज भी किये बैठी हूँ मैं.

जो किया करती थी कभी,

हजारों दिलों पर राज, मैं.

तेरे दिल के द्वार पर

दरबान बनी बैठी हूँ, मैं.

हाँ, इस प्रेम की राजनीति में,

जो कुछ कबूला है मैंने,

वो सच है.

पर कैसे गिर गयी,

मेरी मग़रूर सरकार.

इसका मुझे आज भी अचरज है.





रविवार, 11 अप्रैल 2010

प्रपंच


प्रपंच




दर्द की दीवार हैं,

सुधियों के रौशनदान.

वेदना के द्वार पर,

सिसकी के बंदनवार.

स्मृतियों के स्वस्तिक रचे हैं.

अश्रु के गणेश.

आज मेरे गेह आना,

इक प्रसंग है विशेष.

द्वेष के मलिन टाट पर,

दंभ की पंगत सजेगी.

अहम् के हवन कुन्ड में,

आशा की आहुति जलेगी.

दूर बैठ तुम सब यहाँ

गाना अमंगल गीत,

यातना और टीस की,  

जब होगी यहाँ पर प्रीत.

पोर पोर पुरवाई पहुंचाएगी पीर.

होंगे बलिदान यहाँ इक राँझा औ हीर.

खाप पंचायत बदलेगी,
 
आज दो माँओं की तकदीर.




रविवार, 4 अप्रैल 2010

अन्वेषण


अन्वेषण





आज की इस दौड़ में

सब कुछ नया करने की होड़ में,

कितना कुछ बदल गया है.

असमंजस में पड़ गयी मैं,

जब सुना,

इतने बरसों बाद भी,

नयापन नहीं है प्रेम संवाद में,

डूब गया मन,

तत्क्षण ही  तम के ताल में.

ऊपर आने, उबराने के,

तलाशने लगा विकल्प.

एक कंचन  कौंध का  क्षीण सा संबल ले,

उत्प्लावित हो उठा.

निराशा के  निरीह पोखर से,

निर्वस्त्र बौखलाया सा.

आर्कमिडिज की भांति,

चीत्कार उठा मन

यूरेका, यूरेका, यूरेका,

क्योंकि पा लिया था उसने,

विज्ञान के माध्यम से

प्रेमाभिव्यक्ति में एक नयापन,

किंकर्तव्यविमूढ़ सा कह ही उठा,

मैं चंचल चपला, तुम आलाप बेचारे

मैं त्वरित रहूँ तू अनुचर हो जा रे

हैं दूर दूर पर साथ सदा रे

मैं समीकरण, तुम सिद्धांत  हमारे.



रविवार, 28 मार्च 2010

अहसास

अहसास




आशुतोष ने फिर

उषा का घूँघट उठाया है.

लजा के उसने भी

चेहरा तो दिखया है.

सुहागन हो गयीं दिशाएं सारी

सिंदूर यूँ सजाया है.

पर

ओस की बूंदों का आंचल

दूब के सर से भी तो

तूने ही हटाया है,

क्या बात है दिवाकर

कोई मलिन विचार आया है.

क्या भूल गया प्रतिद्वंदी घन को,

जो कुछ करने पे आ जायेगा,

दूब को चूनर ओढ़ा उषा को ले जाएगा.

मैं तो सदा हद में रही,

चाहे जितना भी ऊँची उड़ी.

तू भी जरा हद, बना ले अपनी

नहीं तो आदमी बन जाएगा.

आदमी बन जाएगा.


रविवार, 21 मार्च 2010

गुरुत्वाकर्षण

गुरुत्वाकर्षण


बचपन में पढ़े तो बहुत थे

विज्ञान के नियम.

पर उनके होने का 

पहला आभास हुआ तब,

जब पहली बार 

तुम्हे देखा भर था,

शाश्वत सा हो गया वो आकर्षण,

मुझे अहसास था.

मैं फिर भी आश्वस्त रही, 

कि किसी न किसी  दिन तो टूटेगा, 

उस न्यूटन का भरम

और मैं स्वतः ही निकल जाऊंगी.

 कभी तुम्हारे दायरे से बाहर.

पर हैरान हूँ मैं, 

उसकी दूरदर्शिता पर 

सत्यापित हो चुके हैं उसके नियम. 

आज भी यथावत है

वो चुम्बकत्व, रोमांच 

तुम, मैं   

तुम्हारी बाँहों के गुरुत्व बल के घेरे

और सम्पूर्णता.


(न्यूटन के नियम :  आम भाषा  में
कोई वस्तु चल रही है तो चलती रहेगी, जब तक कोई रोके नहीं.
हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है.
किन्ही भी दो वस्तुओं के बीच सदैव एक आकर्षण बल होता है, जो गुरूत्वाकर्षण कहलाता है)

रविवार, 14 मार्च 2010

दीवानगी

दीवानगी




ढूंढा करती थी जिन्हें बाग़ औ दरिया में कभी,
जाने क्यों आज वो सारे वीराने मिले.

जम गए थे जो लफ्ज़ कभी सीने में मेरे,
उनको बहाने के आज सौ बहाने मिले.

 इस कदर रुसवा हुआ तू मुझसे,
बस मयखाने में ही तेरे ठिकाने मिले.

पलट के देखा तो झुके हुए अल्फाज़ तेरे,
आज भी  हर सफे पे पुराने मिले.

आ मिल झूम के इक बार फिर मुझसे ऐसे,
जैसे मुद्दत के बाद दो दीवाने मिले.

हद हो गयी तेरी दीवानगी की अब तो,
सूखे हुए लब तेरे आज भी मेरे सिरहाने मिले.  

रविवार, 7 मार्च 2010

द्वन्द

द्वन्द

आज आमाशय की तंग गलियों में

जठर का रिसाव रोज़ की अपेक्षा थोडा कम है.

प्राण वायु व कलुषित वायु की कलह से उपजे,

 वायु के बुलबुले 

जठराग्नि को हवा दे रहे हैं.

फलतः मेरु द्रव में मद्धम - मद्धम

स्पंदन की अनुभूति हुई है,
 
जो मस्तिष्क द्रव से मिल,

 मेरु- मस्तिष्क द्रव में,

अनायास ही कोलाहल में परिणित हुआ है,

 और अब मस्तिष्क पटल पर,

कुछ पीली, सफ़ेद तरंगों के

 उद्दीपन का फैलाव,

 शरीर में एक अजीब सी

नवजात हलचल को जन्म दे रहा है,

क्या ये,

किसी घातक रोग की विलक्षणता के लक्षण हैं.

या

किसी के प्रेम के अनुमोदन का ज्वर

और उसकी मौन स्वीकृति की

उदघोषणा से पहले का

मानसिक द्वन्द.



(प्राण वायु - ओक्सीज़न, कलुषित वायु- कार्बन डाई ऑक्साइड, मेरु द्रव-स्पाइनल फ्लुइड, मस्तिष्क द्रव-सेरेब्रल फ्लुइड, मेरु - मस्तिष्क द्रव---सेरेब्रो- स्पाइनल फ्लुइड)








        

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