दरख़्त
मैं बाहर से सख्त होना चाहती हूँ.
त्यज कर सारी कुटिलता,
ओढ़ कर मुख पे जटिलता,
आश्वस्त होना चाहती हूँ.
मैं एक दरख़्त होना चाहती हूँ.
उजड़ गए जो कुछ घरोंदे,
सांसों में रहते थे मेरे,
बिखरे हुए सारे सिरे.
फिर जोड़ देना चाहती हूँ.
बीते हुए दुःख दर्द सारे,
रीते हुए पल छिन हमारे,
निश्वासों के सहारे,
पतझड़ में,
खो देना चाहती हूँ.
रेशमी धागों के नीड़,
उँगलियों की पोर पे,
फिर से सजाना चाहती हूँ.
मैं बसंत पाना चाहती हूँ.
जीवंत होना चाहती हूँ.
आश्वस्त होना चाहती हूँ.
आसक्त होना चाहती हूँ
मैं बाहर से सख्त होना चाहती हूँ.
हाँ, मैं एक दरख़्त होना चाहती हूँ.










