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रविवार, 14 मार्च 2010

दीवानगी

दीवानगी




ढूंढा करती थी जिन्हें बाग़ औ दरिया में कभी,
जाने क्यों आज वो सारे वीराने मिले.

जम गए थे जो लफ्ज़ कभी सीने में मेरे,
उनको बहाने के आज सौ बहाने मिले.

 इस कदर रुसवा हुआ तू मुझसे,
बस मयखाने में ही तेरे ठिकाने मिले.

पलट के देखा तो झुके हुए अल्फाज़ तेरे,
आज भी  हर सफे पे पुराने मिले.

आ मिल झूम के इक बार फिर मुझसे ऐसे,
जैसे मुद्दत के बाद दो दीवाने मिले.

हद हो गयी तेरी दीवानगी की अब तो,
सूखे हुए लब तेरे आज भी मेरे सिरहाने मिले.  
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