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रविवार, 19 दिसंबर 2010

वियोग

वियोग




काया पूरी सिहर उठी,

हुई उष्ण रश्मि बरसात.

अघात वर्धिनी बातों ने,

था तोड़ा उर का द्वार.

सांसें सिमट गयीं सिसकी में,

आया ऐसा ज्वार.

हुआ रोम रोम मूर्छित,

धमनी में वेदना संचार.

पलक संपुटों में उलझे बिंदु,

गिर गिर लेने लगे शून्य आकार.

मैं खोल व्यथा की गांठ उजवती,

बिछोह का रो रो त्योहार.

वो जाने कैसा पल था,

जब बही वियोग बयार.

रविवार, 11 अप्रैल 2010

प्रपंच


प्रपंच




दर्द की दीवार हैं,

सुधियों के रौशनदान.

वेदना के द्वार पर,

सिसकी के बंदनवार.

स्मृतियों के स्वस्तिक रचे हैं.

अश्रु के गणेश.

आज मेरे गेह आना,

इक प्रसंग है विशेष.

द्वेष के मलिन टाट पर,

दंभ की पंगत सजेगी.

अहम् के हवन कुन्ड में,

आशा की आहुति जलेगी.

दूर बैठ तुम सब यहाँ

गाना अमंगल गीत,

यातना और टीस की,  

जब होगी यहाँ पर प्रीत.

पोर पोर पुरवाई पहुंचाएगी पीर.

होंगे बलिदान यहाँ इक राँझा औ हीर.

खाप पंचायत बदलेगी,
 
आज दो माँओं की तकदीर.




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