पहेली
आजकल मेरे शहर में
जब तब होता है
बादलों का जमावड़ा
बादल की बाँहों में होती है
लुका छिपी वर्षा की
खुश होती हूँ
जानती हूँ दोनों के संगम से
जल्दी ही पनपेंगी
कुछ नन्हीं बूंदें
वर्षा की कोख में
होगी कुछ हलचल
फिर कौंध उठेगी बिजली
उठते ही प्रसव पीड़ा के
जन्म लेंगी नन्ही नन्ही बूंदे
बज उठेंगी थालियाँ
उतरेंगी नन्ही परियां धरती पर
पर कुछ भी नहीं हुआ ऐसा वहां
उठीं अनगिनत उंगलियां
सबने एक ही स्वर में कहा
बाँझ हो गई वर्षा
सोच नहीं पाती हूँ मैं
नहीं है कोई जवाब मेरे पास
वर्षा बाँझ हो गई
या बादल नपुंसक.

