धूप का दर्द
अब तो धूप के भी पांव जलने लगे हैं
अपनी ही तपिश से.
न सहारा न छाँव
कभी यहाँ पेड़ हुआ करते थे.
उनकी टहनियों पर बैठ
सुस्ता लेती थी धूप.
कभी पत्तियों के साथ
आंख मिचोली
कभी पक्षियों संग
छुपन-छुपाई.
अब तो धूप के भी पांव सुलगने लगे हैं
अपनी ही तपिश से.
कंक्रीट के घने ऊँचे जंगल.
सुलगती छतें.
मीलों फैले रेगिस्तान
उस पर रूठी बयार.
पानी को तरसती
धरती की छाती.
अब धूप के पांव में फफोले पड़ने लगे हैं
अपनी ही तपिश से.
सुबह से शाम तक सिर्फ चलना
मीलों मीलों और मीलों.
एक घर से दूसरा
एक गली से दूसरी.
शाम होते होते
बेहाल बेदम बेहोश हो कर
लड़खड़ा कर गिर पड़ती है धूप.
और सारी रात
चांदनी का मलहम लगा कर
किसी कोने में पड़ी
करवटें बदलती कराहती सुबकती है धूप.
फिर अनमने से करती है
अगले दिन का इंतजार.
अब धूप के पांव के घाव बढ़ने लगे हैं
अपनी ही तपिश से.
सोचती है धूप, कि कह दूं
अपने दिल की बात.
कब लगेंगे पेड़
कब फूटेंगी कोपलें.
कब खेलूंगी
धूप छावं का खेल.
कब आँगन में किसी बच्चे की
बन के छाया
अठखेलियाँ करूंगी.
कब आएगा बादल
कब बरसेगी बदली.
कब दिन भर अपने घर बैठ
चिंतन करूंगी.
आगे बढ़ने की दौड़ में
ऐ दुष्ट प्राणी
तूने क्या खोया क्या पाया
पैसा कमाने की होड़ में
भूल गया मुझ दुखयारी को
थक गयी हूँ मैं.
मुझे विश्राम चाहिए
मुझे कुछ पेड़ चाहिए.
कब लगेंगे पेड़
कब फूटेंगी कोपलें.
कब खेलूंगी
धूप छावं का खेल.
कब आँगन में किसी बच्चे की
बन के छाया
अठखेलियाँ करूंगी.
कब आएगा बादल
कब बरसेगी बदली.
कब दिन भर अपने घर बैठ
चिंतन करूंगी.
आगे बढ़ने की दौड़ में
ऐ दुष्ट प्राणी
तूने क्या खोया क्या पाया
पैसा कमाने की होड़ में
भूल गया मुझ दुखयारी को
थक गयी हूँ मैं.
मुझे विश्राम चाहिए
मुझे कुछ पेड़ चाहिए.










