मेरे सपनों के शव
जब पड़े थे बिखरे
आँखों में था रुदन
और हर तरफ क्रन्दन
और हर तरफ क्रन्दन
निराशा के गिद्ध नोंच रहे थे
उनका बदन
इक आशा की डोर
जो कहीं जुड़ी थी सांसों से
बोली वो और फिर टूट गयी
बोली वो और फिर टूट गयी
"यही नियति है सपनों की और जीवन की
अब शवदाह करो"
देख रही थीं आंखे
शवदाह में भी इक नया सपन
इन सपनों से शायद
कोई इक सपना जी जाए
आघात लगा
फिर टूट गया आँखों में कुछ
मुखाग्नि देने चली
समेटे अंजुरी में सपन
जाने कैसे चोट लगी
बिखर गये शव के सब कण
अब सोच रही
वैधव्य तुम्हारा ओढ़
कहीं छुप जाऊं मैं
यदि तुम पुनर्जनम ले
बस जाओ, सदा सदा को
मेरे किसी
मेरे किसी
प्रिय जन की आँखों में








