छल
शांत मन में उठती लहरें
कभी ऊँची, कभी निष्प्राण,
कभी उद्विग्नता की हद को पर करती
जाने क्यों रहने लगी बीमार मैं
जाने किस किस से बेचार मैं
साधने को इस असाध्य रोग
जाने कितने पीर, हकीम, अल्लाह
वल्लाह !
बदल डाले मैंने
और इक तुम थे कि
छलते रहे मुझे सारी उम्र
किसी बिना डिग्री के
झोलाछाप डाक्टर की तरह
