शांति पथ
बाहर हर तरफ हैं
गर्म हवा के बबंडर,
चक्रवात, तपिश, तूफ़ान
और सब कुछ मुरझाया,
सूखा उजड़ा सा.
जमीं पर पड़े सूखे बेदम,
जरा सी हवा में
घसिटते, लड़खड़ाते पत्ते.
आँधियों में
गिरे टूटे कुछ फल,
उनको ले जाने को
व्याकुल लोग.
फिर भी मैं खुश हूँ.
भीतर नमी जो है.
ये नमी कभी मुझे
तरावट का अहसास देती है.
कभी नम सी हरारत.
कभी अपनी ही नमी में,
अपना आँचल भिगो,
साफ़ करती हूँ,
धुंधले आइने को.
खोजती हूँ कुछ
धुंधली होती तस्वीरों को.
कभी एकांत में जा,
अपनी ही नमी में नहा
शांत होती हूँ.
निखरती हूँ,
सवंरती हूँ
और साहस बटोरती हूँ.
फिर से उस
गर्म हवा के
बबंडर,
चक्रवात,
तपिश
तपिश
और तूफ़ान
को सहने का.
