नमीं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नमीं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 23 मई 2010

शांति पथ

शांति पथ





बाहर हर तरफ हैं

गर्म हवा के बबंडर,

चक्रवात, तपिश, तूफ़ान

और सब कुछ मुरझाया,

सूखा उजड़ा सा.

जमीं पर पड़े सूखे बेदम,

जरा सी हवा में

घसिटते, लड़खड़ाते पत्ते.

आँधियों में

गिरे टूटे कुछ फल,

उनको ले जाने को

व्याकुल लोग.

फिर भी मैं  खुश हूँ.

भीतर नमी जो है.

ये नमी कभी मुझे

तरावट का अहसास देती है.

कभी नम सी हरारत.

कभी अपनी ही नमी में,

अपना आँचल भिगो,

साफ़ करती हूँ,

धुंधले आइने को.

खोजती हूँ कुछ

धुंधली होती तस्वीरों को.

कभी एकांत में जा,

अपनी ही नमी में नहा

शांत होती हूँ.

निखरती हूँ,

सवंरती हूँ

और साहस बटोरती हूँ.

फिर से उस

गर्म हवा के

बबंडर,

चक्रवात,

 तपिश 

और तूफ़ान

को सहने का.




रविवार, 6 दिसंबर 2009

छत

छत



घर की छत पर
दीवारों के कोनों में
उगते कुछ नन्हें पौधे
केवल नमीं के सहारे
जीते ये पौधे
कितनी ही बार
नोंच कर फेंक दिए हैं मैंने
हर बार
न जाने कहाँ से
अपने अस्तित्व को बचाने को
ढूँढ ही लाते हैं कुछ नमी
अपने आस-पास
फिर उसी नमी की गोद में
पलते बढ़ते पनपते ये पौधे
वैसे ही
मेरे आँखों की कोर में
बसते कुछ सपने
आँखों की नमी में पनपते
कितनी ही बार
तोड़ दिए हैं मैंने
पर ये सपने हैं कि
अपने अस्तित्व को बनाये रखने को
ढूँढ ही लेते हैं,
आँखों के कोनों में छिपी नमी
हर बार टूट कर और मज़बूत होते सपने
इन सपनों को साकार करने के लिए
चाहिए हर रोज़
नमी की कुछ ताज़ा बूंदें
आँखों की नमीं
अब सिर्फ नमीं नहीं है
ये प्राण वायु है मेरे सपनों की

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...