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रविवार, 6 दिसंबर 2009

छत

छत



घर की छत पर
दीवारों के कोनों में
उगते कुछ नन्हें पौधे
केवल नमीं के सहारे
जीते ये पौधे
कितनी ही बार
नोंच कर फेंक दिए हैं मैंने
हर बार
न जाने कहाँ से
अपने अस्तित्व को बचाने को
ढूँढ ही लाते हैं कुछ नमी
अपने आस-पास
फिर उसी नमी की गोद में
पलते बढ़ते पनपते ये पौधे
वैसे ही
मेरे आँखों की कोर में
बसते कुछ सपने
आँखों की नमी में पनपते
कितनी ही बार
तोड़ दिए हैं मैंने
पर ये सपने हैं कि
अपने अस्तित्व को बनाये रखने को
ढूँढ ही लेते हैं,
आँखों के कोनों में छिपी नमी
हर बार टूट कर और मज़बूत होते सपने
इन सपनों को साकार करने के लिए
चाहिए हर रोज़
नमी की कुछ ताज़ा बूंदें
आँखों की नमीं
अब सिर्फ नमीं नहीं है
ये प्राण वायु है मेरे सपनों की

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

छल

छल



शांत मन में उठती लहरें


कभी ऊँची, कभी निष्प्राण,


कभी उद्विग्नता की हद को पर करती


जाने क्यों रहने लगी बीमार मैं


जाने किस किस से बेचार मैं


साधने को इस असाध्य रोग


जाने कितने पीर, हकीम, अल्लाह


वल्लाह !


बदल डाले मैंने


और इक तुम थे कि


छलते रहे मुझे सारी उम्र


किसी बिना डिग्री के


झोलाछाप डाक्टर की तरह

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