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रविवार, 5 जुलाई 2015

इत्मिनान है की वो खुश हैं

इत्मिनान है की वो खुश हैं

 

चलती हूँ जब भी, 
उतरती चढ़ती हूँ सीढ़ियाँ, 
आती हैं अजब सी आवाज़े,
घुटनों में हड्डियों से,   
कभी कड़ाती, खड़खड़ाती,
कभी कंपकपाती.
गुस्से में लाल पीला होते तो सुना था,
यहाँ तो नीली हो जाती हैं नसें.
दबोचती हैं हड्डियां उन्हें जब. 
कभी खींचती हैं मांस,
कभी बनाती हैं मांस का लोथड़ा. 
दर्द से सराबोर 
न कोई हंसी,
ना खिलखिलाहट,
ना लोच.
कुछ भी तो नहीं रहा अब यहाँ.
मनाती हूँ नसों को, 
दिखाती हूँ लेप का डर. 
नहीं मानती वो.
कभी छुप जाती हैं,
हड्डियों के नीचे, कभी मांस के नीचे. 
होती है सारी रात लुका छिपी, 
इनकी मेरी नींद से.
खुश होती हैं वो कहती हैं.
कभी तुम थे, हम नाहीं,
अब हम हैं तुम नाहीं.

रविवार, 8 जुलाई 2012

दर्द


दर्द 

मेरे आंगन में बरसों से पड़ी
खाली चारपाई पे कल
उनींदी सी पड़ी धूप को 
बाल सुखाते देखा.
थकी निढाल मलिन मुख...
मुझे पास देख खोल दी
क्लांत मन की पिटरिया,
बोली
आज हर कोई भाग रहा है
गगन चुंबी अट्टालिकाओ में रहने को
उसे अपना बनाने को
पहले होते थे
दूर तक फैले बड़े बड़े खेत खलिहान
दूर दूर फैले दो चार मकान
और तब मैं
रोज सूरज के साथ घर से निकलती
फैला देती अपना आंचल एक ही बार में
इस पार से उस पार तक
फिर सारा दिन बच्चों संग छुपन छुपाई
पेड़ पौधों पक्षियों संग आंख मिचोली,
थोडा ऊँघ भी लेती 
किसी दादी अम्मा की गोद में. 
शाम फिर अपना आंचल समेट
अपने प्रियतम संग लौट आती, 
कल फिर आने कि उंमग में. 
चाहती आज भी हूँ 
हर मन, घर, आंगन, खिड़की 
को रौशन करना 
इतनी सीढियाँ इतनी ऊँची इमारत 
चढ़ते चढ़ते ही बीत जाता है दिन
हर इंसान की ही तरह परेशान हूँ मैं भी.


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रविवार, 1 अप्रैल 2012

समय का दर्द


समय का दर्द 
मैं समय हूँ
मैं बलवान हूँ,
बदलता रहता हूँ
घाव भर देता हूँ
कभी अच्छा, कभी बुरा
कभी किसी के लिए ठहरता नहीं
ये उपमाएं दी हैं मुझे, तुम ही लोगों ने
पर मैं क्या और कैसा हूँ
कोई नहीं जानता
मेरे सिवाय
न उठ जाये लोगों का विश्वास मुझसे
उतरने को उन पर खरा
क्या क्या न किया मैंने.
सच तो ये है कि मेरे भी दो चेहरे हैं
मैं अधीर हूँ
दूसरों के दर्द कम करते,
घाव भरते,
मैं स्वयं न भरने वाला
एक घाव हो गया हूँ
जिधर देखो
घाव ही घाव
दर्द ही दर्द
कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे
कितना-कितना भरूं
मैं घाव, दुःख, दर्द, परेशानियों का
अथाह सागर हो गया हूँ
मैं अब ठहरना चाहता हूँ
रुकना चाहता हूँ
थम जाना चाहता हूँ.

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

आंसू

                                  आंसू






                          आंसुओं में आज अपने, फिर नहा कर


                    मैं अपने दर्द का, इज़हार करना चाहती हूँ


                  दूर ही रहना ऐ खुशिओं,पास तुम आना नहीं


                मैं अभी कुछ और पल, इंतजार करना चाहती हूँ


                    आज तक पल छिन मिले जो,सब शूलों के दंश से


                    मैं शूल दंशों से,अपना श्रंगार करना चाहती हूँ


                   पीर का हर एक मनका,बांध के रखा था जो


                  मैं उसी माला की,भेंट चढ़ना चाहती हूँ


                बात जो हमने कही, वो कंटकों सी चुभ गयी


                 मैं अपनी कही हर बात, वापस लेना चाहती हूँ


                 रास्ता हमने चुना जो, आज मुश्किल हो गया


               अब  एक पल जो सुख मिले, तो मौत के ही पल मिले


                   मैं इसी अहसास को, जीवित रखना चाहती हूँ


                    आज तुमको, साथ में अपने रुला कर


                    मैं आंसुओं की आज फिर, बरसात करना चाहती हूँ


                     आंसुओं में आज अपने, फिर नहा कर


                   मैं अपने दर्द का, इज़हार करना चाहती हूँ



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