इत्मिनान है की वो खुश हैं
चलती हूँ जब भी,
उतरती चढ़ती हूँ सीढ़ियाँ,
आती हैं अजब सी आवाज़े,
घुटनों में हड्डियों से,
कभी कड़कड़ाती, खड़खड़ाती,
कभी कंपकपाती.
गुस्से में लाल पीला होते तो सुना था,
यहाँ तो नीली हो जाती हैं नसें.
दबोचती हैं हड्डियां उन्हें जब.
कभी खींचती हैं मांस,
कभी बनाती हैं मांस का लोथड़ा.
दर्द से सराबोर
न कोई हंसी,
ना खिलखिलाहट,
ना लोच.
कुछ भी तो नहीं रहा अब यहाँ.
मनाती हूँ नसों को,
दिखाती हूँ लेप का डर.
नहीं मानती वो.
कभी छुप जाती हैं,
हड्डियों के नीचे, कभी मांस के नीचे.
होती है सारी रात लुका छिपी,
इनकी मेरी नींद से.
खुश होती हैं वो कहती हैं.
कभी तुम थे, हम नाहीं,
अब हम हैं तुम नाहीं.


