इज़हार
आंसुओं में आज अपने,
फिर नहा कर
मैं अपने दर्द का,
इज़हार करना चाहती हूँ
दूर ही रहना ऐ खुशिओं,
पास तुम आना नहीं
मैं अभी कुछ और पल,
इंतजार करना चाहती हूँ
आज तक पल छिन मिले,
सब शूलों के दंश से
मैं शूल दंशों से,
अपना श्रंगार करना चाहती हूँ
पीर का हर एक मनका,
बांध के रखा था जो
मैं उसी माला की,
भेंट चढ़ना चाहती हूँ
बात जो हमने कही,
वो कंटकों सी चुभ गयी
मैं अपनी कही हर बात,
वापस लेना चाहती हूँ
रास्ता हमने चुना जो,
आज मुश्किल हो गया
एक पल जो सुख मिले,
तो मौत के ही पल मिले
मैं इसी अहसास को,
जीवित रखना चाहती हूँ
आज तुमको साथ में,
अपने रुला कर
मैं आंसुओं की फिर,
बरसात करना चाहती हूँ
आंसुओं में आज अपने,
फिर नहा कर
मैं अपने दर्द का,
इज़हार करना चाहती हूँ
