रविवार, 4 जुलाई 2010

समय


समय




असमय ही,

समय के कुछ पल बह गए थे.


सहेजा बहुत,

सो कुछ रह गए थे.


एक समय था,

समय से मेरी अंजुरी भरी थी.

पर समय, तो समय से,

सरकता रहा.

मैं सोती रही,

वो खोता रहा.

नींद से जागी,


जब सबेरा हुआ,



पर अंजुरी थी खाली,


वो न मेरा हुआ.


सहेजे बहुत मैंने,


बहके हुए पल


पर,


समय पर,


समय को बनाना न आया.

जो छूटा था पीछे,

उसको लाना न आया.


सभी को नचाया,

इशारे पे अपने


पर शायद

समय को नचाना न आया.





रविवार, 27 जून 2010

भाव शून्य

"भाव शून्य"






वो बहुत खुश थी

बरसों से प्रतीक्षारत थी,

जिस ख़ुशी के लिए

वो उसे मिल जो गयी थी.

जीवन में एक पूर्णता,

एक सम्पूर्ण नारीत्व,

एक अजीब सी हलचल,

उत्साह और..

पूरी देह में सिहरन

पर न जाने क्यों,

उस सम्पूर्ण नारीत्व को देखने की चाह,

उसमें जाग उठी.

फिर क्या था,

एक कमरा तार मशीनें और

कुछ चहलकदमी.

अचानक कुछ हलचल हुई.

नेह के ताल में एक नन्ही सी जान.

गालों में गहरे गड्ढे,

एक शांत सौम्य मुस्कान.

फिर एक अंगडाई,

पांव लम्बे खिंचे,

दूर तक जाते हाँथ,

घूमता शरीर,

फिर वही शांत सौम्य मुस्कान.

उसी पल पाया उसने.

अपनी देह में, नन्हे पांवों का कोमल स्पर्श,

कोहनिओं की हड्डियों की मीठी चुभन.

खो जाना चाहती थी वो उसमें

पर हैरान थी वो !!!!

न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे

अचानक भाव शून्य हो गए थे ...

 
 
 

रविवार, 20 जून 2010

आशीष

आशीष




मैं एक माँ हूँ ...

पर मैं तुम्हे हर माँ की तरह

ये आशीष नहीं दूंगी,

कि सूरज बनो, सूरज की तरह चमको,

छा जाओ पूरे ब्रह्माण्ड पर,

वश में कर लो पूरी धरती,

बंध जाओ एक समय सीमा में

अपितु, मैं तुम्हें आशीष दूंगी

तुम चाँद बनो, कुछ कम चमको,

यथार्थ में होते हुए भी

कभी अपनी उपस्थिति

न दर्ज करा पाने का दर्द समझो

अमावस के चाँद से

अपने पास बिखरे नन्हे सितारों से

घुलो, मिलो, उन्हें भी चमकने का अवसर दो.

दूज के चाँद की तरह,

कभी वेदना, संवेदना, प्रणय और बिछोह को

व्यक्त करने का माध्यम बनो,

कहीं किसी प्रेमी युगल को संरक्षण दो,

अपने उजाले में,

एक पूनम के चाँद की तरह

और हाँ !

कभी सूरज की पूर्ण उपस्थिति में

दिन के उजाले में,

आकाश के किसी कोने में,

सूरज से सिर्फ चंद क़दमों के फ़ासले पे,

अपने होने को प्रमाणित करो

ताकि लोग पूंछे

ये किसका चाँद है ??

जो आकाश में सूरज के सामने भी टिका है.





रविवार, 13 जून 2010

धुंआ

धुंआ





जाने कुछ अजीब सी बात है

तुममें

बुरी चीजों में भी कुछ अच्छा

सोच ही लेते हो अपने लिए

तभी तो तुमने धुंए से सीखा

ऊपर, ऊपर और ऊपर उठना

फैलना, मिलना, मशहूर होना

कभी आँखों में उतरना

फिर वो भला आंसू की तरह ही क्यों न हो

तुम्हारी रुचि तो

जलने, जलाने, धुंए और राख में है ना !!!

फिर तुमने सिगरेट को ही क्यों चुना ???

शायद तुम्हारी चाहत हो

तुम धुंआ और ऊँचाई

मैं राख और तुम्हारे एकदम पास

तुम्हारे ही क़दमों में,

पर क्यों नहीं चुना तुमने

किसी थर्मल पावर प्लांट को,

उसके कोयले को

जहाँ तुम वही धुंआ, ऊँचाई,

पर मैं, राख, नहीं!!

फ्लाई ऐश,

और पांव न...हीं

मेहनतकश लोगों के हाथों का कोमल स्पर्श

और बन सकूँ एक खुबसूरत, पर सुदृढ़ ईंट

कहीं दीवार बन, दे सकूँ अपनापन

कहीं ममता की छावं देती छत

कभी एक भरपूर घर का अहसास

ये सच है,  कि  तुम अच्छा सोच लेते हो

पर इतना अच्छा भी नहीं !!!



रविवार, 6 जून 2010

जीवाश्म

जीवाश्म



संकेत, सूत्र औ संरचना


इंगित करते हैं जिस रचना को


उसके कल अनुमान मिले हैं


गूंज रहे इस शाद्वल में


प्रणय के कुछ गान मिले हैं


पर्वत, घाटी, नदिया, झरनों पर


अपने कुछ वृत्तांत मिले हैं


हिमखंडों के भीतर बाहर


तेरे मेरे नाम मिले हैं


अपनी भंगुर सांसों की माला के,


मनके सुबहो शाम मिले हैं


हर जीवन में तुझको माँगा


पर अश्रु के अनुदान मिले हैं


मेरे नयन व्यथा से गीले


घाटी के उस पार मिले हैं


अधर सधर के बीच फंसे


मेरी सांसों के सारांश मिले हैं


जाने कितनी सदियाँ बीतीं


जाने कैसे रतियाँ बीतीं


तब जा करके तुमको, मेरी


आँखों, सांसों औ बातों के


ये सारे जीवाश्म मिले हैं


संकेत, सूत्र औ संरचना


इंगित करते हैं जिस रचना को


उसके कल जीवाश्म मिले हैं.

रविवार, 30 मई 2010

राहें

राहें



कभी भूल गए थे, जिन राहों को

कल, मैंने उन पर चल कर देखा

प्रेम पसारे, राहें तकते 

उनको   आज वहीँ पर देखा

मैंने कितनी धारें बदलीं, 

हर पल अपनी  राहें बदलीं

नाते-रिश्ते,  दुनियादारी,

जाने कितनी बाहें बदली

पर, आस बिछाए,  सांसें ओढ़े

उनको फिर भी जगते देखा 

आओ लौट चलें उन पर फिर

उनमें   मैंने सम्मोहन देखा

आज की इन नयी राहों पर

कहाँ   नेह  बरसते   देखा  

 कभी भूल गए थे जिन राहों को

कल मैंने उन पर चल कर देखा




रविवार, 23 मई 2010

शांति पथ

शांति पथ





बाहर हर तरफ हैं

गर्म हवा के बबंडर,

चक्रवात, तपिश, तूफ़ान

और सब कुछ मुरझाया,

सूखा उजड़ा सा.

जमीं पर पड़े सूखे बेदम,

जरा सी हवा में

घसिटते, लड़खड़ाते पत्ते.

आँधियों में

गिरे टूटे कुछ फल,

उनको ले जाने को

व्याकुल लोग.

फिर भी मैं  खुश हूँ.

भीतर नमी जो है.

ये नमी कभी मुझे

तरावट का अहसास देती है.

कभी नम सी हरारत.

कभी अपनी ही नमी में,

अपना आँचल भिगो,

साफ़ करती हूँ,

धुंधले आइने को.

खोजती हूँ कुछ

धुंधली होती तस्वीरों को.

कभी एकांत में जा,

अपनी ही नमी में नहा

शांत होती हूँ.

निखरती हूँ,

सवंरती हूँ

और साहस बटोरती हूँ.

फिर से उस

गर्म हवा के

बबंडर,

चक्रवात,

 तपिश 

और तूफ़ान

को सहने का.




मंगलवार, 18 मई 2010

लक्ष्मण रेखा

लक्ष्मण रेखा




मेरे लक्ष्मण  मस्तिष्क ने
मेरे चहुँ  ओर
खींच रखे हैं
कुछ रंगीन टेढ़े - मेढ़े से घेरे.

मेरे रावण मन की
लोलुप निगाहों ने
बार बार प्रलोभन भी दिया.

शायद, मैं 
लखन के घर की कैद
से बाहर आ भी गई होती.

पर दशानन मन के
अस्फुट संवाद
घुलने लगे कानों में.

कौन बचायेगा इन्हें
राम...................???
आज के युग की
लुप्तप्राय प्रजाति !!!

कभी मन में
राम बसा करते थे
पर अब सिर्फ मैं !!!

एक मौन अट्टहास
गुंजायमान कर गया
दसों दिशाओं  को

कंपायमान हो उठा
रोम रोम
मेरी अंतर्निहित रघुबर भावनाएं
एक बार फिर हतोत्साहित हो उठी.

सच ही तो है,
आज
भावनाओ  के लिए
जगह ही कहाँ  है...???

और सीता....!!!!
कहीं अगर कोई होगी भी वो
तो कहीं वनवास, कहीं अग्निपरीक्षा दे
राख का ढेर हो चुकी होगी.

मैं अपनी लक्ष्मण रेखाओं
के घेरे मे खुश हूँ.

मै जान चुकी हूँ
मन मस्त्षिक और भावनाओं  


की जंग मे
मस्तिष्क की रेखाओं
के पास ही है
सुरक्षाकवच.



रविवार, 9 मई 2010

दरख़्त


दरख़्त




मैं बाहर से सख्त होना चाहती हूँ.

त्यज कर सारी कुटिलता,

ओढ़ कर मुख पे जटिलता,
 
आश्वस्त होना चाहती हूँ.
 
मैं एक दरख़्त होना चाहती हूँ.
 
उजड़ गए जो कुछ घरोंदे,
 
सांसों में रहते थे मेरे,
 
बिखरे हुए सारे सिरे.
 
फिर जोड़ देना चाहती हूँ.
 
बीते हुए दुःख दर्द सारे,
 
रीते हुए पल छिन हमारे,
 
निश्वासों के सहारे, 
 
पतझड़ में,
 
खो देना चाहती हूँ.
 
रेशमी धागों के नीड़,
 
उँगलियों की पोर पे,
 
फिर से सजाना चाहती हूँ.
 
मैं बसंत पाना चाहती हूँ.
 
जीवंत होना चाहती हूँ. 
 
आश्वस्त होना चाहती हूँ.
 
आसक्त होना चाहती हूँ 
 
मैं बाहर से सख्त होना चाहती हूँ.
 
हाँ, मैं एक दरख़्त होना चाहती हूँ.   
 
 
     

रविवार, 2 मई 2010

जलकुम्भी


जलकुम्भी





सड़क के किनारे

कच्ची मिटटी में

ठहरे पानी और नमी में

फैली ऐ जलकुम्भी !

पसर जाओ, मेरी आँखों में भी.

फैलाओ  

हरियाली का छद्मावरण.

सोख लो नमी.

इसके पहले कि  इन आँखों  से,

 सीली दीवारों से झरती

 चूने की पपड़ी की तरह,

वो सब कुछ झर जाये,

जिसे बस अपने तक ही,

सीमित रखने का प्रण लिया था कभी,

और दिखने लगे 

पपड़ी झरने के बाद के,

वो बदनुमा धब्बे.

न होने दो अहसास किसी को

यहाँ भी कभी यौवन से परिपूर्ण पर्यावरण था.

जो लांछन, दोषारोपण और छिद्रान्वेषण

के प्रदूषण के चलते.

सूख कर,

खारे पानी की,

चंद बूंदों में सिमट कर रह गया है.



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