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रविवार, 6 जून 2010

जीवाश्म

जीवाश्म



संकेत, सूत्र औ संरचना


इंगित करते हैं जिस रचना को


उसके कल अनुमान मिले हैं


गूंज रहे इस शाद्वल में


प्रणय के कुछ गान मिले हैं


पर्वत, घाटी, नदिया, झरनों पर


अपने कुछ वृत्तांत मिले हैं


हिमखंडों के भीतर बाहर


तेरे मेरे नाम मिले हैं


अपनी भंगुर सांसों की माला के,


मनके सुबहो शाम मिले हैं


हर जीवन में तुझको माँगा


पर अश्रु के अनुदान मिले हैं


मेरे नयन व्यथा से गीले


घाटी के उस पार मिले हैं


अधर सधर के बीच फंसे


मेरी सांसों के सारांश मिले हैं


जाने कितनी सदियाँ बीतीं


जाने कैसे रतियाँ बीतीं


तब जा करके तुमको, मेरी


आँखों, सांसों औ बातों के


ये सारे जीवाश्म मिले हैं


संकेत, सूत्र औ संरचना


इंगित करते हैं जिस रचना को


उसके कल जीवाश्म मिले हैं.

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