सबेरे की सैर,
वो मिश्री घोलता संगीत.
हर पल अपने पल का अहसास,
तुम्हारी मीठी बातों में,
कोलेस्ट्राल तो घुल गया
अब शायद मेरी बारी है .....
(2)
कभी दिल जोरों से धड़क जाता था,
उनके आने पर,
और कभी उनके न आने पर.
कभी सांसे बेतरतीब हो जाती थीं.
उनसे नज़र मिल जाने पर,
या फिर बिछड़ जाने पर.
कभी दिल दिमाग अनियंत्रित हो जाता था.
उनका स्पर्श पाने पर,
या कभी उसका अहसास हो जाने पर,
अब सब नियंत्रित है
अब तो लगता वही मुझे मेरा पेस मेकर है,
उन मजबूत बाहों से लिपट जाने पर.
