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रविवार, 25 सितंबर 2011

आगोश

आगोश 




रात के आगोश से सवेरा निकल गया, 

समंदर को छोड़ कर किनारा निकल गया.   


रेत की सेज पे चांदनी रोया करी,   

छोड़ कर दरिया उसे, बेसहारा निकल गया.


सोई रही जमी, आसमाँ सोया रहा, 

चाँद तारों का सारा नज़ारा निकल गया.


ठूंठ पर यूँ ही धूप ठिठकी सुलगती  रही, 

साया किसी का थका हारा निकल गया. 


गूंगे दर की मेरे सांकल बजा के रात, 

कुदरत का कोई इशारा निकल गया.  


घुलती रही मिसरी कानों में सारी रात,

हुई सुबह तो वो आवारा बंजारा निकल गया.


बाँहों में उसकी आऊं, पिघल जाऊं,
ख्वाब ये मेरा कंवारा निकल गया.

मेरी तस्वीर पे अपने लब रख कर, 

मेरे इश्क का वो मारा निकल गया.

चित्र मेरे कैमरे से, अन्य चित्रों के लिये मेरे दूसरे ब्लॉग "Perception" जिसका पता है shashwatidixit.blogspot.com, पर भी जाएँ.

रविवार, 12 जून 2011

अनुभव


अनुभव     


जीने का तरीका समझने लगी हूँ.
अपना नजरिया बदलने लगी हूँ. 
जीवन का अनुभव है या...
सकारात्मक सोच में रहने लगी हूँ. 
पीछे देखती हूँ अवसाद, अपराध, 
ईर्ष्या मवाद से भरी हूँ. 
बैठ जाती हूँ याद करती हूँ,
इन अहसासों को भरने वाले कारक 
गिन गिन कर निकालने लगी हूँ...
सुबह खिड़की के पास 
फैले रेत के ढ़ेर पर
एक एक नाम लिखने लगी हूँ.
जीने का तरीका समझने लगी हूँ.
अपना नजरिया बदलने लगी हूँ.
पीछे घूम कर देखती हूँ,
प्यार, मीठे, अहसास, खूबसूरत पल, 
खुशियों से भरने लगी हूँ. 
बैठ जाती हूँ याद करती हूँ, 
इन अहसासों को भरने वाले कारक 
गिन गिन फिर निकालने लगी हूँ...
सुबह आंगन में रखे पत्थरों  पर
एक एक नाम उकेरने लगी हूँ.
जीने का तरीका समझने लगी हूँ. 
अपना नजरिया बदलने लगी हूँ. 
अब तो दिन दिन भर
खिड़की पे खड़े हो 
रेत और पत्थर को निहारने लगी हूँ. 
रेत पर तो निशान हैं ही नहीं, 
पत्थरों पे लिखे नाम,
पढ़ मुस्कुराने लगी हूँ. 
कहते हैं इंसान पत्थर सा हो गया है,
कुछ सुनहरे अहसास उकेर कर 
दिमाग को अपने पत्थर समझने लगी हूँ. 
जीने का तरीका समझने लगी हूँ. 
अपना नजरिया बदलने लगी हूँ. 
जीवन का अनुभव है या...
सकारात्मक सोच में रहने लगी हूँ.  
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