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रविवार, 24 जून 2012

पत्थर


पत्थर

मैं हूँ पत्थर
खुशबू, ख़ुशी और 
सुर्ख रंग का सौदागर.   
पीसता हूँ, 
पिसता हूँ, 
देखता हूँ, 
सुनता हूँ,
समझता हूँ 
मौन रहता हूँ 
नहीं बजती 
शहनाई 
किसी घर
मेरे बिना 
हर दुल्हन की 
हथेलियों को 
सजाता हूँ,
मैं ही,
हर सजनी को 
उसके साजन से 
मिलाता हूँ
मैं ही     
मैं हूँ पत्थर
खुशबू, ख़ुशी और 
सुर्ख रंग का सौदागर. 
दूसरों की जिंदगी में 
रंग भरता
अपनी जिंदगी में 
गम भरता
नहीं आती 
मेरे लिए  
मेरे पास 
कोई ख़ुशी. 
नहीं आती 
मेरे लिए  
मेरे पास 
सुर्ख़  हथेलियाँ , 
सुर्ख़ जोड़ा 
और सजनी.
नहीं चढ़ता 
मुझ पर 
कोई सुर्ख़ रंग कभी.
मेरे पास रहती है 
बस उसकी सुगंध 
मैं वो पत्थर हूँ
रंग लाती है 
हिना जिस पर 
पिस जाने के बाद.
मैं हूँ पत्थर
खुशबू, ख़ुशी और 
सुर्ख रंग का सौदागर.  

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

इंसान

इंसान



कहते हैं लोग

इन्सान पत्थर हो गया

अगर ये सच है तो

दिखा दे अपनी सख्ती,

अपना खुरदरा, पथरीला, कंकरीलापन

अपनी जड़ता,

जा, छू जा, कभी किसी राम के चरणों से

दे दे किसी अहिल्या को जीवन दान

बन राम सेतु,

जीत ले लंका, मार गिरा कभी रावण,

बचा ले, अबला सीताओं की लाज,

बन पारस, कभी निर्धनता के लिए,

डट जा, चीन की दीवार बन, साम्प्रदायिकता के आगे

पीस दे आपने दो पाटों के बीच महंगाई कभी

गिर, भर भरा के, बिना सीमेंट की छत की तरह,

कर दे लहू लुहान भ्रष्टता को कभी,

जा गिर, मर और मार

एक उल्का पिंड की तरह निकृष्टता  को कभी

समा जा किसी देश द्रोही की आँखों, में किरकिरी बन

चुनवा दे अपनी दीवार में,

अनारकली की जगह, आतंकवाद कभी

पर अफ़सोस, ऐ इंसान

तू तो पूरा पत्थर भी न हुआ.




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