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रविवार, 1 जुलाई 2012

हसरतें


हसरतें 
सुनती आई हूँ
सपने देखने में पैसे नहीं खर्च होते
पर सच तो ये है
उन्हें पालने पोसने में
एक उम्र खर्च हो जाती है
मैंने भी देखे कितने ही सपने
कुछ जन्मे, कुछ अजन्मे ही
छोड़ गए मुझे अकेला
अधर में इस धरा पे
कुछ खिसके, रेंगे, लड़खड़ाए
और कुछ...
अपने पैरों पर चल निकले
तभी डाल दी गयीं 
बेडियाँ उन पैरों में
दिन बदले, साल बदले, जमाना बदला
न टूटी, न तोड़ी गयीं, 
न खुलीं, न खोली गयीं बेडियाँ.
आज अपाहिज हो गए हैं
सपने मेरे
पर मैं खुश हूँ
जानती हूँ बैसाखियाँ दे दूँ 
तो कुछ दिन तो और 
साथ निभा जायेंगे ये
मेरी उम्र से लंबी इनकी उम्र जो है.
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