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रविवार, 23 जून 2013

विकास की इबारत

विकास की इबारत 


आज कल देखती हूँ हर शाम
लोगों को बतियाते, फुसफुसाते
जाती हूँ करीब
करती हूँ कोशिश
सुनने की समझने की
कि पास के बाग में
पेड़ों पर रहते हैं भूत
नहीं करती विश्वास उन पर
पहुँचती हूँ बाग में
देखती हूँ हरी भरी घास
छोटे नन्हें पौधों को अपनी छत्रछाया में
बढ़ने और पनपने का अवसर देते
चारों तरफ फैले बड़े ऊँचे दरख़्त
कुछ भी असहज नहीं लगता
बढती हूँ दरख्तों की ओर
अचानक कुछ आहट, सरसराहट
पत्तों में कंपकंपाहट
अचानक सांसों को रोकने से
उठती अकुलाहट
बडबडाती हूँ मैं
मैं अदना सा इंसान
न बाउंसर, ना बौडी बिल्डर
भला मुझसे क्या और कैसा डरना
मेरी बात से हिम्मत पा
एक नन्हा पौधा बोल ही पड़ा
हम तो डरते हैं
आप जैसे हर किसी से
क्योंकि हम नहीं जानते
कब किस वेश में आ जाय
यमराज रूपी कोई बिल्डर.

रविवार, 30 दिसंबर 2012

कब लगेंगे पेड़


कब लगेंगे पेड़
कब फूटेंगी कोपलें,
कब खेलूंगी
धूप छावं का खेल.
कब आँगन में किसी बच्चे की
बन के छाया
अठखेलियाँ करूंगी.
कब आएगा बादल.
कब बरसेगी बदली.
कब दिन भर अपने घर बैठ
चिंतन करूंगी.
आगे बढ़ने होड़ में,
ऐ दुष्ट प्राणी!
तूने क्या खोया, क्या पाया?
पैसा कमाने की होड़ में
भूल गया मुझ दुखयारी को.
थक गयी हूँ मैं.
मुझे विश्राम चाहिए.
मुझे कुछ पेड़ चाहिए.

रविवार, 14 अगस्त 2011

साथ...


साथ...


बहुत दिनों बाद
बगीचे की सैर को पहुँची
मुझे देख
वहां के दरख़्त, पेड़, झाड़ियाँ
और यहाँ तक कि टूटे पत्ते भी
मुस्कुराये, खिलखिलाए, तालियाँ बजाईं.    
ठंडी हवा खिलखिलाई, खुशबू महकाई   
तारो ताजा हो उठी मैं, 
फिर उठी और चल पड़ी.
तभी बुजुर्ग दरख़्त की
एक डाली लटकी, लचकी और 
मेरे पास आई
और कानों में बोली
कभी आ जाया करो यहाँ भी
अच्छा लगता है.


(चित्र असम के शिवसागर में स्थित रोंगघर के अंदर से बगीचे का है, मेरे अपने चित्रों में से एक)
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