विकास की इबारत
आज कल देखती हूँ हर शाम
लोगों को बतियाते, फुसफुसाते
जाती हूँ करीब
करती हूँ कोशिश
सुनने की समझने की
कि पास के बाग में
पेड़ों पर रहते हैं भूत
नहीं करती विश्वास उन पर
पहुँचती हूँ बाग में
देखती हूँ हरी भरी घास
छोटे नन्हें पौधों को अपनी छत्रछाया में
बढ़ने और पनपने का अवसर देते
चारों तरफ फैले बड़े ऊँचे दरख़्त
कुछ भी असहज नहीं लगता
बढती हूँ दरख्तों की ओर
अचानक कुछ आहट, सरसराहट
पत्तों में कंपकंपाहट
अचानक सांसों को रोकने से
लोगों को बतियाते, फुसफुसाते
जाती हूँ करीब
करती हूँ कोशिश
सुनने की समझने की
कि पास के बाग में
पेड़ों पर रहते हैं भूत
नहीं करती विश्वास उन पर
पहुँचती हूँ बाग में
देखती हूँ हरी भरी घास
छोटे नन्हें पौधों को अपनी छत्रछाया में
बढ़ने और पनपने का अवसर देते
चारों तरफ फैले बड़े ऊँचे दरख़्त
कुछ भी असहज नहीं लगता
बढती हूँ दरख्तों की ओर
अचानक कुछ आहट, सरसराहट
पत्तों में कंपकंपाहट
अचानक सांसों को रोकने से
उठती अकुलाहट
बडबडाती हूँ मैं
मैं अदना सा इंसान
न बाउंसर, ना बौडी बिल्डर
भला मुझसे क्या और कैसा डरना
मेरी बात से हिम्मत पा
एक नन्हा पौधा बोल ही पड़ा
हम तो डरते हैं
आप जैसे हर किसी से
क्योंकि हम नहीं जानते
कब किस वेश में आ जाय
यमराज रूपी कोई बिल्डर.
हम तो डरते हैं
आप जैसे हर किसी से
क्योंकि हम नहीं जानते
कब किस वेश में आ जाय
यमराज रूपी कोई बिल्डर.
प्रकृतिरुपी यमराज से कौन मुकाबला कर पाया है. सुन्दर पंक्तियाँ.
जवाब देंहटाएंबहुत ही सार्थक प्रस्तुती ,आभार।
जवाब देंहटाएंबहुत ही सामयिक एवं सार्थक रचना रचना जी
जवाब देंहटाएंनमस्कार
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (24-06-2013) के :चर्चा मंच 1285 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
मेरी कविता को चर्चामंच में शामिल करने के लिये धन्यबाद सरिता जी.
हटाएंइन्ही निर्माण कर्ताओं की वज़ह से शहर उजड़ रहे हैं।
जवाब देंहटाएंएक दम सटीक रचना।
इन्ही निर्माण कर्ताओं की वज़ह से शहर उजड़ रहे हैं।
जवाब देंहटाएंएक दम सटीक रचना।
जब तक प्रकृति डरती है तब तक ठीक वरना उसे भी अपना रौद्र रूप दिखाना आता है ।
जवाब देंहटाएंप्राकृति डरती नहीं अपनी बात विनम्रता के कहने का प्रयास करती है ... नहीं तो रोडे रूप तो दिखाना आता है उसे ....
जवाब देंहटाएंविकास की लेखनी विनाश लिख गयी।
जवाब देंहटाएंवनमाफिया पर करारा व्यंग्य -
जवाब देंहटाएंमहानगर ने फैंक दी मौसम की संदूक ,
पेड़ परिंदों से हुआ जब जब बुरा सुलूक .
पेड़ पांडवों पर हुआ ,जब जब अत्याचार ,
ढांप लिए वटवृक्ष ने तब तब दृग के द्वार .
अपने विकास या कहें स्वार्थ को लेकर इतने बेखबर हैं कि पेड़-पौधों के ये बातें ज़्यादातर लोग सुन ही नहीं पाते ।
जवाब देंहटाएंकाश सब पहले ही समझ जाते
जवाब देंहटाएंसार्थक अभिव्यक्ति
बहुत गुमान था,नदियों को बांधते, मानव
जवाब देंहटाएंकेदार ऐ खौफ में ही, उम्र, गुज़र जायेगी !
देखती हूँ हरी भरी घास
जवाब देंहटाएंछोटे नन्हें पौधों को अपनी छत्रछाया में
बढ़ने और पनपने का अवसर देते
Main Bhi Ek Chhota-Mota Lekhak Hu
Utsahbardhan & Sujhav Dete ranha.
Panap Jaunga.
बहुत सुन्दर ...
जवाब देंहटाएंसुषमा तीनों लोक की कुल होते हैं पेड़ .
जवाब देंहटाएंयहाँ गुल का एक अर्थ गुल होना भी है बिजली की तरह गायब होना है विलुप्त होना है वनस्पति सा .
बढ़िया पोस्ट .
विचारणीय ....प्रशंसनीय रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर अर्थपूर्ण कविता
जवाब देंहटाएंlatest postमेरे विचार मेरी अनुभूति: जिज्ञासा ! जिज्ञासा !! जिज्ञासा !!!
बहुत सुंदर कमाल की भावाव्यक्ति
जवाब देंहटाएंसामयिक प्रस्तुति ....
जवाब देंहटाएंऊपर वाली के आगे किसी का जोर कहाँ ..
विकास के पीछे छिपी विनाश के सूक्ष्म बीज को आपने सही पहचाना है रचना जी
जवाब देंहटाएंबिल्डरों की पांचों घी में हैं
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया,सुंदर अभिव्यक्ति ,,,
जवाब देंहटाएंRecent post: एक हमसफर चाहिए.
बिल्डर, टिंबर मर्चेन्ट, नदियां प्रदूषित करने वाले उद्योगपती, कितने कितने रूप में आते हैं यमराज ।
जवाब देंहटाएंसार्थक प्रस्तुति..अब तो चेतें..
जवाब देंहटाएंबहुत ही सामयिक और सार्थक प्रस्तुतीकरण ....मेरी एक रचना की कुछ पक्तियाँ याद आ गईं..."आदमी में ही है देवता आदमी में ही शैतान है"...बहुत-बहुत बधाई...
जवाब देंहटाएं@मानवता अब तार-तार है
प्रकृति की विनाश लीला अपरम्पार है सुन्दर भाव युक्त पोस्ट बधाई
जवाब देंहटाएंसच में प्रकृति के साथ हम विकास के नाम पर खिलवाड़ कर रहे हैं...बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...
जवाब देंहटाएंविचारणीय एवं प्रशंसनीय अभिव्यक्ति...
जवाब देंहटाएंप्रकृति की विनाश लीला....सार्थक प्रस्तुतीकरण रचना जी
जवाब देंहटाएंइतना डर मेरे भीतर पहले कभी नहीं था। आपने इसकी मार्मिक प्रस्तुति की है। आभार
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