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रविवार, 4 सितंबर 2011

अहाता


अहाता
  

  
यादों के अहाते में उजड़ने बसने के कई किस्से हैं 
अवसाद  कि कहीं खाई, कहीं खुशियों के टीले हैं

गिरती हुईं दीवारें, कहीं छत से झड़ते पलस्तर हैं 
मिश्री सी मीठी बातें कहीं स्वर कर्कश और कंटीले हैं 

उम्मीद के दरख्तों से झूलती खुशामद की लताएँ है 
कहीं मायूसी के झाडों पे मुरझाये फूल पीले हैं 

चलती हूँ अकेले फिर भी साथ में कोई... है
लगता है उस पल, दिन कितने नशीले हैं

आँखों के जुगुनुओं से, दिखता अर्श का नज़ारा है
जिधर भी देखो मन को दिखती कंदीलें ही कंदीलें हैं 

उस सिसकती माटी की, अपनी अलग कहानी है 
वहाँ दफ़न कई वादे किसी के, आज भी सीले है    

इक मोड पे ठहरी हूँ, दिखती मुझे मंजिल है
मेरे घर से मंजिल का सफर उफ्फ्फ...रस्ते पथरीले हैं 

हर ओर कीचड़ है ज़मीं पे, चाँद  तारे भी भीगे हैं  
ये सब बारिश से नहीं मेरे आंसुओं से गीले हैं  

यादों के अहाते में उजड़ने बसने के कई किस्से हैं 
अवसाद  कि कहीं खाई, कहीं खुशियों के टीले हैं.
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