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रविवार, 22 अप्रैल 2012

परिवर्तन या स्थाइत्व

परिवर्तन या स्थाइत्व 



पिछली कविता की व्यथा
कल सागर को क्या सुना दी
मेरी बात समाप्त होने से पहले ही
हाहाकार कर चीत्कार उठा वो
भिगो गया मुझे नख शिख
बोला,
परिवर्तन के लिए मुझे बाध्य करेगा जो
मिटा दूँगा उसे, समाहित कर लूँगा अपने में
मैं भयभीत हो भागने को आतुर हुई.
सो बोल उठा, 
ये तो बस एक ही पहलू है
नदी तो शांत, सौम्य, मृदुल और मीठी होती है
संस्कारी पुरुष, धर्म गुरु, साध्वी, माताएं आती हैं यहाँ.
करते हैं वे आचमन, आराधना, अर्चना और स्नान.
धुल जाते है पाप, 
हो जाता है शांत चित्त.
और मैं..., मैं..हूँ.
"मेचो मैन" "लेडीज़ किलर"
न जाने कितनी ही नदियाँ, उनकी धाराएँ,
कल कल का नाद लिए मीलों का सफर तय कर
मुझमें समाहित होने को आतुर होती हैं.
मुझमें समाहित होती हैं.
अनगिनत बिकनी बालाएं नमकीन होने को,
नमक इश्क का चखने को
खिंची चली आती हैं मेरी ओर.
फिर परिवर्तन क्यों और कैसा?
लौट आई मैं
शायद हर कोई बाध्य नहीं है परिवर्तन को.
मात्र दुर्बल और असहाय ही विवश
किए जाते हैं...
या हो जाते हैं ?

रविवार, 15 अप्रैल 2012

परिवर्तन


परिवर्तन

परिवर्तन सृष्टि का नियम है
ये प्रगति का द्योतक है,
ये ही समय की मांग है.
फिर भी कभी वांछनीय, कभी अवांछनीय है
पुरुष वेश में स्त्री, स्त्री वेश में पुरुष तो आज मान्य है
किन्तु स्त्री का पूर्ण पुरुष,
पुरुष का पूर्ण स्त्री में परिवर्तन
कुछ असहज सा लगता है.
मैं भी जानती हूँ एक ऐसी ही
नदी/ युवती/ स्त्री को
कभी नवयौवना सी अल्हड़, मदमस्त.
अपने ही पाटों को तोड़ बिखरने को आतुर
कभी प्रेयसी बन अपने प्रियतम के पांव पखारती
कभी जननी बन देती जन्म असंख्य कमल कुमुदनियों को
कभी ममता से ओत-प्रोत पुचकारती, दुलराती.
जल जीव-जंतुओं को,
कल उसे ही देखा,
काली, लंबी, सिकुड़ी, सहमी, सिमटी पर सुडौल (टाल, डार्क, हैंडसम)
क्या किसी ने कानों में रस घोला था ?
स्त्री होने से बेहतर है, टाल, डार्क, हैंडसम पुरुष ?
अपने अस्तित्व को बचाए रखने का मात्र उपाय था ?
समाज के उत्पीड़न से बचने का विकल्प ?
कुछ भी हो...
स्वेच्छा से तो न धरा होगा उसने ये रूप.
हाँ! मैंने...

सच मैंने...
अपनी आँखों के सामने
लिंग परिवर्तन होते देखा है.
यमुना नदी को नाले का रूप धरते देखा है.
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