तुम मुझे बहुत याद आते हो,
मेरी तनहाइओं में, सुनसान वीरानों में,
मेरे अनबुझे से प्रश्न।
क्यों होते हैं कुछ रिश्ते,
कांच से नाज़ुक, कुछ ढाल से मजबूत,
कुछ रौशनी में परछाई, कुछ कागज़ पर रोशनाई।
तुम मुझे बहुत याद आते हो, मेरे अनबुझे से प्रश्न।
क्यों नाज़ुक रिश्ता दरज़ता है।
क्यों मजबूत रिश्ता खड़ा रहता है।
क्यों परछाई रोशनी का नहीं छोडती साथ।
क्यों कागज़ पर लिखा रिश्ता नहीं होता आबाद।
तुम मुझे बहुत याद आते हो, मेरे अनबुझे से प्रश्न।
चारों तरफ फैला दुःख अवसाद और क्षोभ. रिश्तों पर ढ़ीली होती पकड़. अतीत के धूमिल होते पल क्षिन. वर्तमान में उन्हें एक बार फिर जी लेने की प्रबल उत्कंठा. कभी शब्दों के माध्यम से होती रचना की अभिव्यक्ति. कभी रचना के माध्यम से अभिव्यक्त होते कुछ शब्द.
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
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