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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

परीक्षण


परीक्षण

वो मिश्री से मीठे बोल तुम्हारे 
पहली बार सुने थे जब मैंने 
कितना सकुचाई थी लजाई थी मैं 
लाज में लपेट कर,
छुपा दिए थे कहीं वो बोल तुम्हारे 
आज इतने बरसों बाद .....
याद नहीं कितने ..
बीस पच्चीस ....
तुम्हारे छुवन की 

सिहरन का अहसास भूले 
वो बोल तुम्हारे 
समय कि चादर ओढ़े 
आज भी वहीँ पड़े हैं बेसुध 
क्या इस वसंतोत्सव प्रणय पर्व पर 
अपनी उँगलियों कि पोरों से सहलाकर
जीवंत कर दोगे उन बोलों को      
या इस बार भी 
मात्र कनखियों से देखोगे मुझे और मुस्कुरा दोगे 
यदि ये सच है तो
तो इस बार मैं 
उन बोलों कि तह तक जाना  चाहूंगी 
जानना चाहूंगी 
कि इतने बरसों 
क्षण क्षण हर क्षण 
क्या इतना क्षरण हो चुका है .... 
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