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रविवार, 31 जुलाई 2022

रुसवाई

रुसवाई 

 


ईरानी गलीचे पर फैलता इश्क 

गाव तकिये पर अपने आप को सहारा देते 

गिर गिर पड़ते शेर 

अपनी सरहदों को छोड़ हारमोनियम पर 

सर टिकाये 

काफ़िया - रदीफ़ 

तबले के भीतर चुपचाप पड़ी 

सहमी सी थापें 

आँखों से टपकते अशआर

कागज़ के सलीब पर टंगी 

कुछ बेजुबान नज्में 

बाँहों में मातम सी पसरने को बेताब 

अनगिनत, अनकही गज़लें मेरी 

होंठों की मुंडेरों पर ख़राशों से तराशे हुए 

इरशाद और मुक़र्रर से 

चंद अल्फाज़ 

भरे गले की सरहद पर 

फंदे से झूलती मौसिकी 

बंद कमरे की चारदीवारों के बीच 

मचलती बेबस हुस्न की रुसवाई 

ये और कुछ भी नहीं 

तुम्हारी न के जवाब में 

मेरी बेपनाह मुहब्बत की रुसवाई की हद है

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