सरगोशी
बारिश में भीगी
गीली सीली
सराबोर धूप ने
कल मेरी
सांकल बजाई.
राहत की साँस ली,
चलो कहीं कोई तो है.
हताश थी,
कितना हठी,
और बेपरवाह
है सूरज.
जब भी आता है,
धूप के बिना
नहीं आता.
सूरज और धूप
ज्यों धूप और साया
हो गये.
आ जाओ,
कभी बदली का
आंचल भी थाम लो
कभी उसके पीछे भी
छुप जाओ
कभी तो छोड़ दो
धूप को अकेला
मैं इतना सिर्फ
इसलिए कह रही हूँ
सबको तपिश देने वाले
कभी तो जानो
किसी के न होने का अर्थ.