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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

गतिशास्त्र


गतिशास्त्र

"जीवन चलने का नाम"
"चलते रहो सुबहो शाम"
"जीवन गति है"
"गति ही जीवन है"
जाने किसने,
कैसे
और क्यों कह दिया ये ?
क्यों नहीं देख पाते वो
इसके पीछे की गणित
और मेहनत.
तभी बात बेबात कहते हैं
"फ़ाइल और कागज़ चलते ही नहीं"
नहीं जानते हैं वो
गति में सापेक्षता होती हैं.
वस्तु के भार और
उस पर लगे बल की दिशा में जाने की
फाइल पर जितना भारी बण्डल
उतनी ही उसकी गति
जाने क्या सोचता होगा
गति के नियम बनाने वाला,
अपने और अपने नियम के बारे में.
आश्चर्य होता है
जब गति के नियमों की धज्जियाँ उड़ाता हुआ,
कोई आस्तित्वान हीन कागज़
किसी भारी बण्डल के प्रभाव में,
त्वरित गति से गंतव्य पर पहुँच
आस्तित्व में आ जाता है.
तब शायद गति के नियम बनाने वाला ही
आस्तित्वहीन हो जाता है.
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